निकाह (Islamic Marriage) को अल्लाह ने बहुत ही आसान बनाया था, लेकिन आज हमारे समाज ने इसे बहुत ही मुश्किल कर दिया है? उसके ताम-झाम और रस्मो रिवाज इतने बढ़ गए हैं कि आप पहचान नहीं पाएंगे असली दीन कहाँ ख़त्म होता है और हमारे समाज के पुराने रस्म-ओ-रिवाज़ कहाँ से शुरू होते हैं |
“लोग क्या कहेंगे,” “खानदान की नाक,” और सोशल मीडिया के दिखावे ने निकाह जैसे मुक़द्दस (Holy) रिश्ते को, एक तरह का “बोझ” और “डर” बना दिया है ।लेकिन क्या इस्लाम वाक़ई यही सिखाता है? बिल्कुल नहीं! क़ुरआन और सुन्नत की नज़र में…
निकाह बोझ नहीं, बल्कि रहमत है।
दिखावा नहीं, बल्कि इबादत है।
सौदा नहीं, बल्कि दो दिलों का रूहानी अहद है।
तो अगर आप भी इन रस्मों और हक़ीक़त के बीच उलझे हुए हैं, तो यह पोस्ट आपके लिए एक Eye-Opener साबित होगी।
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10 Misconceptions About Nikah
आज हम Qur’an और Sunnah की रौशनी में निकाह की 10 ग़लतफ़हमियाँ (10 Misconceptions About Nikah) बताएँगे, जिन्हें अगर समझ लिया जाए तो न सिर्फ़ शादियाँ आसान हो सकती हैं, बल्कि रिश्तों में वह बरकत भी आ सकती है।
गलत-फ़हमी न.1: “महर दुल्हन की क़ीमत होती है”
हक़ीक़त ये है कि महर किसी इंसान की क़ीमत नहीं है बल्कि इस्लाम में महर, औरत की इज़्ज़त, उसकी आज़ादी और उसका शरई हक़ है न कि कोई सौदा। क़ुरआन बहुत साफ़ अल्फ़ाज़ में कहता है कि औरतों को उनका महर ख़ुशी-ख़ुशी दिया जाए। यानि इसमें न एहसान का लहजा हो, न बोझ का एहसास, और न ही ये महसूस कराया जाए कि कोई “क़ीमत” अदा की जा रही है।
असल में महर एक तोहफ़ा है वो तोहफ़ा जो शौहर अपनी मोहब्बत, ज़िम्मेदारी और ख़ुलूस के साथ देता है और महर पूरी तरह औरत की मिल्कियत होती है, उस पर न तो माँ-बाप का हक़ है और न ही ससुराल का हक़ है यहाँ तक कि शौहर भी बिना उसकी रज़ामंदी के उसके महर में दख़ल नहीं दे सकता।
अफ़सोस की बात यह है कि समाज ने महर को या तो बहुत ज़्यादा नुमाइश (दिखावे) का ज़रिया बना दिया है, या फिर बिल्कुल हल्का समझ लिया है। जबकि इस्लाम का मिज़ाज बीच का रास्ता सिखाता है, इज़्ज़त के साथ, आसानी के साथ, और दिल की रज़ा के साथ।
आसान समझिए:
- महर क़ीमत नहीं, हक़ है
- महर लेन-देन नहीं, मोहब्बत की अलामत है
- महर दिखावा नहीं, औरत की हिफ़ाज़त है
अमली मशवरा: महर तय करते वक़्त यह मत देखिए कि “लोग क्या कहेंगे”, बल्कि यह देखिए कि “अल्लाह क्या पसंद करता है।”
गलत-फ़हमी न. 2: महर जितना बड़ा होगा, निकाह उतना ही कामयाब होगा
हमारे समाज में एक अजीब-सी सोच बैठ चुकी है, अगर महर बड़ा है, तो रिश्ता मज़बूत होगा, अगर महर छोटा है, तो निकाह हल्का समझा जाएगा। बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है ये
जबकि हक़ीक़त तो यह है कि बड़े महर से शादी कामयाब नहीं होती, बल्कि सही नियत और अल्लाह का ख़ौफ़ शादी को कामयाब बनाता है। नबी करीम ﷺ की ज़िंदगी देखिए। सबसे बरकत वाली शादियाँ वही थीं जिनमें न ताम-झाम था, न भारी-भरकम महर, और न दिखावे का कोई दबाव।
यहाँ तक कि हज़रत फ़ातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा, जो नबी ﷺ की बेटी थीं, उनका महर भी बेहद सादा था। अगर महर की “रक़म” से इज़्ज़त तय होती, तो सबसे बड़ा महर वहीं होना चाहिए था। लेकिन इस्लाम ने हमें सिखाया, क़ीमत नहीं, क़दर देखो।
अमली मशवरा: महर तय करते वक़्त अपनी हैसियत, अपने हालात, और सबसे ज़्यादा अपने दिल की सच्चाई को सामने रखिए। ऐसा महर रखिए जो काग़ज़ पर अच्छा दिखे ही नहीं, बल्कि वक़्त आने पर अदा भी किया जा सके। और याद रखिए जो महर बोझ बन जाए, वह निकाह की मिठास को भी फीका कर देता है।
गलत-फ़हमी न. 3: “महर सिर्फ़ एक रस्म है, इस्लाम का असल हिस्सा नहीं”
बहुत-से घरों में यह बात आम तौर पर कही जाती है
“अरे, महर तो बस नाम का होता है…”
“निकाह हो जाए, बाद में देख लेंगे…”
“ये सब तो पुरानी रस्में हैं…”
ये सोचना बहुत बड़ी ग़लती है। हक़ीक़त यह है कि महर कोई रस्म नहीं, बल्कि इस्लाम का साफ़ हुक्म है, और इसके बिना निकाह अधूरा है। और इस्लाम में महर सिर्फ़ ऑप्शन नहीं है, बल्कि यह औरत का तय-शुदा हक़ है। नबी ﷺ के दौर में भी हर निकाह में महर तय किया जाता था। कभी कम, कभी ज़्यादा, लेकिन तय ज़रूर किया जाता था। इसलिए ये जानना ज़रूरी है कि…
- महर रस्म नहीं, शरई हुक्म है
- महर एहसान नहीं, औरत का हक़ है
- महर दहेज नहीं, इस्लामी ज़िम्मेदारी है

गलत-फ़हमी न.4: “वली लड़की को ज़बरदस्ती निकाह में दे सकता है”
यह गलत-फ़हमी सबसे ज़्यादा नुकसानदेह है। कई घरों में आज भी यह सोच ज़िंदा है कि “बाप है, जो फ़ैसला करेगा वही सही होगा”, या “लड़की की क्या मरज़ी, उसे तो मानना ही पड़ेगा।” लेकिन इस्लाम इस सोच को जड़ से ख़ारिज करता है।
हक़ीक़त यह है कि इस्लाम में लड़की की रज़ामंदी के बिना निकाह जायज़ ही नहीं। निकाह ज़बरदस्ती का नाम नहीं, बल्कि दिल की रज़ा से होने वाला एक पाक एहद है।
वली का मतलब “मालिक” नहीं होता, वली का मतलब होता है हिफ़ाज़त करने वाला। जो लड़की के फ़ायदे को देखे, उसकी इज़्ज़त की रखवाली करे, और उसे ग़लत फ़ैसले से बचाए। न कि ऐसा शख़्स जो समाज के दबाव में या अपनी ज़िद के चलते लड़की की ज़िंदगी का फ़ैसला थोप दे।
नबी करीम ﷺ के दौर में ऐसे कई मामले सामने आए जहाँ लड़कियों ने शिकायत की कि उनका निकाह उनकी मर्ज़ी के बिना किया गया। और नबी ﷺ ने ऐसे निकाह को रद्द कर दिया।
गलत-फ़हमी न. 5: “निकाह होते ही ज़िंदगी अपने-आप परफेक्ट हो जाती है”
बहुत-से लोग दिल में यह उम्मीद लेकर निकाह करते हैं कि अब सब ठीक हो जाएगा। तनाव ख़त्म, परेशानियाँ ख़त्म, और हर दिन सिर्फ़ मोहब्बत ही मोहब्बत होगी।
लेकिन जब हक़ीक़त इससे अलग निकलती है, तो शिकायतें शुरू हो जाती हैं “शादी के बाद तो सब बदल गया…” “हमने तो ऐसा सोचा ही नहीं था…” “निकाह के बाद भी मुश्किलें क्यों हैं?”
लेकिन हक़ीक़त यह है कि निकाह किसी परफेक्ट ज़िंदगी की गारंटी नहीं, बल्कि एक मुक़द्दस शुरुआत है। निकाह से बरकत तो आती है, लेकिन समझ, सब्र और मेहनत के बिना कोई रिश्ता अपने-आप जन्नत नहीं बन जाता। क़ुरआन हमें यह नहीं सिखाता कि शादी के बाद कभी मतभेद होंगे ही नहीं। बल्कि यह सिखाता है कि मतभेद हों तो भलाई, नर्मी और सब्र से निपटा जाए।
नबी करीम ﷺ की ज़िंदगी देखिए, घर के कामों में हाथ बँटाना, नाराज़गी पर चुप रहना, और ग़लती पर माफ़ कर देना यही वो उसूल हैं जो शादी को मज़बूत बनाते हैं।
अगर सिर्फ़ “फीलिंग्स” पर रिश्ता टिका हो, तो वह ज़्यादा देर नहीं चलता। लेकिन अगर रिश्ता ज़िम्मेदारी, रहम और ख़ुलूस पर खड़ा हो, तो वही सुकून देता है।
बस इतना समझ लीजिये:
- निकाह अंत नहीं, शुरुआत है
- मोहब्बत अपने-आप नहीं चलती, निभानी पड़ती है
- सब्र और बातचीत शादी की जान हैं
गलत-फ़हमी न. 6: “इस्लाम में हर शादी ज़बरदस्ती या सिर्फ़ अरेंज्ड ही होती है”
अक्सर यह जुमला सुनने को मिलता है—
“इस्लाम में तो लड़की-लड़के की कोई मरज़ी ही नहीं होती…”
“जो घर वाले तय कर दें, वही निकाह होता है…”
“पसंद की शादी तो इस्लाम में ग़लत समझी जाती है…”
हक़ीक़त यह है कि इस्लाम ज़बरदस्ती की शादी को सख़्ती से मना करता है। निकाह दिलों के जुड़ने का नाम है, न कि दबाव में निभाए जाने वाले रिश्ते का। इस्लाम यह बिलकुल नहीं कहता कि लड़का-लड़की अकेले ही सब तय करें और परिवार को बिल्कुल अलग कर दें। लेकिन यह भी नहीं कहता कि परिवार जो कहे वही आख़िरी फ़ैसला हो।
इस्लाम बीच का रास्ता सिखाता है, जहाँ पसंद भी हो, मशवरा भी हो, और इज़्ज़त भी बनी रहे। नबी ﷺ के दौर में लोग अपनी पसंद का ज़िक्र करते थे, परिवार से बात होती थी, और फिर निकाह होता था। यानी न चोरी-छुपे रिश्ते, न ज़बरदस्ती के फ़ैसले।
आज की सबसे बड़ी ग़लती यह हो गई है कि या तो हर चीज़ पर पाबंदी लगा दी जाती है, या फिर पूरी आज़ादी के नाम पर हदें तोड़ दी जाती हैं। जबकि इस्लाम न पाबंदी सिखाता है, न बेलगाम आज़ादी बल्कि पाक, साफ़ और ज़िम्मेदार रिश्ता सिखाता है।
आसान अल्फ़ाज़ में समझिए:
- अरेंज्ड शादी ग़लत नहीं
- लव मैरिज अपने-आप में हराम नहीं
- ज़बरदस्ती की शादी इस्लाम में जायज़ नहीं
गलत-फ़हमी न. 7: “मुहर्रम के महीने में निकाह करना मना है”
यह बात हमारे समाज में इतनी मज़बूती से फैली हुई है कि लोग बिना पूछे-समझे इसे दीन का हिस्सा मान लेते हैं। कि“ये ग़म का महीना है…इसलिए इसमें खुशियाँ मनाना सही नहीं…”
हक़ीक़त यह है कि क़ुरआन और सुन्नत में कहीं भी मुहर्रम में निकाह को मना नहीं किया गया। यह एक समाजी सोच है, दीन की तालीम नहीं। इस्लाम ने जिन चार महीनों को इज़्ज़त वाला बताया है, उनमें मुहर्रम भी शामिल है। और इज़्ज़त वाले महीने में हलाल काम को हराम ठहरा देना ख़ुद दीन के उसूल के ख़िलाफ़ है।
हाँ, यह बात ज़रूर है कि मुहर्रम हमें सब्र, सादगी और याद-दिहानी का पैग़ाम देता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि निकाह जैसे पाक अमल को टाल दिया जाए। अगर निकाह सादगी से हो, बिना दिखावे के, बिना फ़िज़ूल ख़र्ची के, तो उसमें कोई बुराई नहीं।
सादा अल्फ़ाज़ में समझिए:
- मुहर्रम में निकाह हराम नहीं
- इसकी मनाही की कोई सही दलील नहीं
- हलाल को हराम बनाना ग़लत है
गलत-फ़हमी न. 8: “छुपा हुआ (सीक्रेट) निकाह भी पूरी तरह सही होता है”
हक़ीक़त यह है कि इस्लाम निकाह को छुपाने के बजाय ज़ाहिर करने की तालीम देता है। निकाह कोई चोरी-छुपे किया जाने वाला काम नहीं, बल्कि इज़्ज़त और ज़िम्मेदारी के साथ निभाया जाने वाला रिश्ता है। शरई तौर पर निकाह के लिए इजाब-क़ुबूल, गवाह, और महर ज़रूरी है, लेकिन नबी ﷺ ने निकाह के ऐलान पर भी ज़ोर दिया।
क्यों? ताकि औरत के हक़ महफ़ूज़ रहें। ताकि कल को कोई इंकार न कर सके। ताकि रिश्ता शक और अफ़वाहों से बचा रहे। अक्सर देखा गया है कि छुपा हुआ निकाह औरत के लिए सबसे ज़्यादा नुक़सानदेह साबित होता है। न इज़्ज़त की हिफ़ाज़त, न क़ानूनी सहारा, और न समाजी पहचान। इस्लाम ज़ुल्म का दरवाज़ा बंद करता है, खोलता नहीं।
आसान अल्फ़ाज़ में समझिए:
- निकाह छुपाने की चीज़ नहीं
- ऐलान निकाह की हिफ़ाज़त है
- सीक्रेट निकाह फ़ितनों की वजह बन सकता है
अमली मशवरा: निकाह हमेशा गवाहों की मौजूदगी में, परिवार की जानकारी में, और मुमकिन हो तो क़ानूनी रजिस्ट्रेशन के साथ करें।
गलत-फ़हमी न. 9: “निकाह-हलाला तलाक़ का आसान इलाज है”
यह शायद निकाह से जुड़ी सबसे बड़ी गलत फ़हमी भी है और गलत इस्तेमाल की गई बात है। आज हालत यह हो गई है कि तलाक़ के बाद लोग फौरन कह देते हैं “हलाला करा लो, मसला हल हो जाएगा…” लेकिन यहीं पर दीन की रूह के साथ एक बड़ा ज़ुल्म होता है।
हक़ीक़त यह है कि इस्लाम में ‘प्लान किया हुआ’ हलाला सख़्त गुनाह है। हलाला कोई ट्रिक नहीं, कोई शॉर्टकट नहीं। इस्लाम ने जब तीसरी तलाक़ के बाद दोबारा पहले शौहर से निकाह को मना किया, तो उसके पीछे एक गहरी हिकमत थी, ताकि तलाक़ को मज़ाक न बनाया जाए।
असल हलाला तब होता है जब औरत अपनी मर्ज़ी से किसी दूसरे आदमी से नॉर्मल निकाह करे, फिर अगर वह रिश्ता बिना किसी साज़िश और प्लानिंग के ख़ुद-ब-ख़ुद टूट जाए, तभी पहली शादी की गुंजाइश बनती है।
लेकिन किसी आदमी को पैसे देकर, एक रात के लिए निकाह करके, और फिर तलाक़ दिलवाना, यह सब इस्लाम में सख़्ती से मना है। नबी ﷺ ने ऐसे बनावटी हलाला पर सख़्त नाराज़गी ज़ाहिर की है। क्योंकि इसमें औरत को सिर्फ़ एक ज़रिया बना दिया जाता है, जबकि इस्लाम औरत की इज़्ज़त की हिफ़ाज़त करता है।
आसान अल्फ़ाज़ में समझिए:
- बनावटी हलाला हराम है
- तलाक़ को हल्के में लेना दीन के ख़िलाफ़ है
अमली मशवरा: तलाक़ का लफ़्ज़ ज़ुबान पर लाने से पहले हज़ार बार सोचिए। ग़ुस्से में लिए गए फ़ैसले ज़िंदगी भर का पछतावा बन सकते हैं। अगर मसला पैदा हो जाए, तो पहले मशवरा, काउंसलिंग, और बुज़ुर्गों की मदद लें। याद रखिए इस्लाम रिश्ते तोड़ने नहीं, बचाने की तालीम देता है।
गलत-फ़हमी न.10: “टेम्पररी (nikah Mut’ah) निकाह जायज़ है”
लेकिन यह सोच इस्लाम की रूह के बिल्कुल ख़िलाफ़ है। हक़ीक़त यह है कि निकाह इस्लाम में हमेशा के इरादे से किया जाने वाला एहद है। निकाह कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं जिसे जब मन किया तोड़ दिया, और जब मन किया जोड़ लिया।
इस्लाम निकाह के साथ ज़िम्मेदारी, वफ़ादारी, और खुलापन जोड़ता है। छुपे इरादे, और आधी सच्चाई, ये सब निकाह को कमज़ोर कर देते हैं। नबी करीम ﷺ ने साफ़ तालीम दी कि निकाह का ऐलान हो, ज़िम्मेदारी कबूल की जाए, और औरत के हक़ पूरे किए जाएँ।
Conclusion:
अगर आप एक लाइन में समझना चाहें, तो बस इतना याद रखिए
निकाह इस्लाम में बोझ नहीं, रहमत है। यह समाज की बनाई हुई मुश्किलों का नाम नहीं, बल्कि अल्लाह की तरफ़ से दी गई एक आसान और पाक नेमत है। जब हम गलत-फ़हमियों को छोड़कर क़ुरआन और सुन्नत की सादगी अपनाते हैं, तो निकाह सिर्फ़ दो लोगों का रिश्ता नहीं रहता, बल्कि दो दिलों के लिए सुकून बन जाता है।
निकाह दिखावे से नहीं चलता,
निकाह सच्चाई से चलता है।
निकाह पैसों से नहीं टिकता,
निकाह नियत से मज़बूत होता है।
दिल में उठने वाले आम सवाल (FAQs)
1. क्या कम महर रखना ग़लत है?
नहीं, कम महर बिल्कुल जायज़ है, अगर वह इज़्ज़त और रज़ामंदी और ईमानदारी के साथ तय किया गया हो।
2. क्या लड़की की रज़ामंदी वाक़ई ज़रूरी है?
हाँ। बिना रज़ामंदी के निकाह इस्लाम में सही नहीं माना जाता।
3. क्या अरेंज्ड शादी इस्लाम में मजबूरी होती है?
नहीं। अरेंज्ड शादी तभी सही है जब लड़की-लड़का दोनों राज़ी हों।
4. क्या मुहर्रम में निकाह करना गुनाह है?
नहीं। इसकी कोई शरई मनाही मौजूद नहीं है।
5. क्या सीक्रेट निकाह से बचना चाहिए?
हाँ। क्योंकि इससे अक्सर औरत के हक़ प्रभावित होते हैं और शक व फ़ितने पैदा होते हैं।
6. क्या हलाला आसान रास्ता है?
बिल्कुल नहीं। प्लान किया हुआ हलाला सख़्त ग़लत और हराम है।
7. निकाह को आसान कैसे बनाया जाए?
सादगी अपनाकर, दिखावे से बचकर, और अल्लाह पर भरोसा रखकर।