अज़ीज़ों! हमारे पास सब कुछ है दौलत भी, तालीम भी, टेक्नोलॉजी भी लेकिन फिर भी दिल बेचैन है, नींद उड़ चुकी है, सुकून ग़ायब है। हर कोई पूछ रहा है: “दिल को इत्मीनान कैसे मिले?” “ज़िंदगी में बरकत क्यों नहीं?” “दुआएँ कबूल क्यों नहीं होतीं?”
और फिर इन सवालों का जवाब हम मोटिवेशनल किताब में ढूँढते हैं, जबकि इनका जवाब उस किताब में छुपा है जो ख़ास कर सारे इंसानों की हिदायत के लिए उतरी है, और वो है कुरआन-ए-करीम। याद रखना! यह कोई आम किताब नहीं है, इससे दिल जिंदा होते हैं, रूहों को सुकून मिलता है, और भटके हुए इंसान को सही रास्ता मिलता है।
लेकिन आज कुरआन को पढ़ना तो दूर, हमें उसे सिर्फ़ ताक़ों में सजाकर रख देते हैं। और घर में इतने ऊंचे रखते हैं, जहाँ हाथ भी न पहुंचे, हालाँकि जिस दिन इंसान कुरआन से जुड़ता है,तो उसका ताल्लुक़ इसके रब से जुड़ जाता है, और उसी दिन से उसकी ज़िंदगी संवरने लगती है, और जिस दिन कुरआन छूट जाता है, तो उसका ताल्लुक़ उसके रब से टूट जाता है, उस दिन सब कुछ होते हुए भी सब कुछ छूट जाता है।
इसीलिए आज हम बात करने जा रहे हैं 12 Big Benefits Of Quran-e-Kareem की, यानि ऐसे 12 अज़ीम और ज़िंदगी बदल देने वाले फ़ायदे, जो हमारी दुनिया को भी बेहतर बनायेंगे, और इंशा अल्लाह आखिरत को भी रोशन कर देंगे।
तो आइए देखें, कि जब एक बंदा सच्चे दिल से कुरआन-ए-करीम की तिलावत करता है, तो अल्लाह तआला उसे किन-किन नेअमतों और इनामों से नवाज़ते हैं।
1. ईमान में इज़ाफ़ा और दिल का सुकून
आप को मालूम ही होगा कि आज हर दूसरा इंसान डिप्रेशन, तनाव (Stress) और घबराहट से परेशान है। उसे सुकून की तलाश है, लेकिन जब उसे सुकून की तलाश होती है, तो वो दवाइयां खाता है, हॉलिडे पर जाता है, लेकिन सुकून फिर भी नहीं मिलता।
कैसे मिलेगा? जब सुकून का पता (Address) अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने कुरआन में बताया है, कि जब एक मोमिन कुरआन की आयतें पढ़ता है, तो उसके दिल की बेचैनी खत्म होने लगती है। और चूँकि कुरआन रूह की गिज़ा है इसलिए जैसे बिना खाने के शरीर कमजोर हो जाता है, वैसे ही बिना तिलावत के रूह कमजोर और बेचैन हो जाती है।
अल्लाह तआला सूरह रअद में इरशाद फरमाता है: "أَلَا بِذِكْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ" तर्जुमा: “जान लो! अल्लाह के ज़िक्र से ही दिलों को इत्मीनान (सुकून) मिलता है।” ( (सूरह रअद, आयत 28)
और कुरआन अल्लाह का सबसे बड़ा ज़िक्र है इसलिए जब आप इसे पढ़ते हैं, तो अल्लाह की रहमत आपके दिल पर उतरती है, और दुनिया की फिक्रें छोटी लगने लगती हैं।

2. रहमत-ए- का नुज़ूल और फरिश्तों का घेरा
अगर आप चाहते हैं कि आप जहां बैठें, वहां अल्लाह की खास रहमत हो, और नूरानी फरिश्ते आपके पास आएं, तो आप को मालूम होना चाहिए कि तिलावत की एक बड़ी फजीलत और इनाम यह भी है कि जब कोई तिलावत करता है या सीखता और सिखाता है तो अल्लाह की रहमत उसको ढांप लेती है।
प्यारे नबी ﷺ ने फरमाया:
"जब कोई जमात अल्लाह के घरों में कुरआन की तिलावत और उसकी तालीम (सीखने-सिखाने) में मशगूल होती है, तो उन पर सकीनत (खास सुकून) नाज़िल होती है, रहमत उन्हें ढांप लेती है, और फरिश्ते उन्हें चारों तरफ से घेर लेते हैं। और अल्लाह तआला फरिश्तों की मजलिस में उनका ज़िक्र फख्र से करता है।"
(सहीह मुस्लिम)
सोचिए! हम कमज़ोरों पर अल्लाह की रहमत इस क़दर कि हम यहां टूटी-फूटी तिलावत करें, और अर्श पर अल्लाह अपने फरिश्तों के सामने हमारा नाम लें । लेकिन बड़े बद किस्मत हैं हम लोग कि कुरआन की अज़मत से बिलकुल बेख़बर हैं, इसीलिए कुरआन को नज़र अंदाज़ कर देते हैं, लेकिन फ़रिश्ते, ज़रा सोच कर देखिये! कि आप कुरआन पढ़ रहे हैं और फ़रिश्ते आपके चारों तरफ़ मौजूद हैं। एक इन्सान के लिए इससे बड़ी इज़्ज़त और क्या हो सकती है?
3. अल्लाह की मोहब्बत और कुर्बत हासिल होती है
कुरआन हो या नमाज़, ये दोनों इबादतें अल्लाह से बात करने और Contact करने का जरिया है, इसीलिए बुजुर्गों ने कहा है कि जब तुम चाहो कि अल्लाह तुमसे बात करे, तो कुरआन पढ़ा करो। और जब तुम चाहो कि अल्लाह तुम से बात करे, तो नमाज़ पढ़ा करो।
हदीस ने कुरआन को “हबलुल्लाह” यानि (अल्लाह की रस्सी) बताया है। मतलब कुरआन एक ऐसी रस्सी है जिसका एक सिरा अल्लाह के हाथ में है और दूसरा सिरा तुम्हारे हाथ में। जो इसे मजबूती से थाम लेता है, वो कभी गुमराह नहीं होता, कभी भटकता नहीं है।
4. गुनाहों की माफी और दुआओं की कुबूलियत
हम कोई फ़रिश्ते तो हैं नहीं, जो हम से कोई गुनाह न हो, इन्सान होने की हैसियत से हमसे जाने-अनजाने में दिन-रात गुनाह होते ही रहते हैं। और हमारी आंखें, हमारे कान, और हमारी जुबान सभी गुनाह में मुलव्विस रहते हैं, उन में कुछ गुनाह सगीरा होते हैं और कुछ गुनाह कबीरा होते हैं, तो अगर आप कुरआन की तिलावत करते हैं, तो ये तिलावत इन सगीरा गुनाहों को धोने का काम करती है। इसके बारे में …
अल्लाह तआला सूरह हूद में फरमाता है:
"إِنَّ الْحَسَنَاتِ يُذْهِبْنَ السَّيِّئَاتِ
"तर्जुमा: “बेशक नेकियां बुराइयों को मिटा देती हैं।”
(हवाला: सूरह हूद, आयत 114)
तिलावत करना एक बहुत बड़ी नेकी है, जिसमें हर हर्फ पर 10 नेकियां मिलती हैं। और
इमाम इब्ने कसीर रह. फरमाते हैं कि कुरआन खत्म करने के बाद दुआ कुबूल होती है।
तो अगर कोई तिलावत के बाद अल्लाह से सच्चे दिल से कहे: “ऐ अल्लाह! मैंने तेरी रज़ा के लिए ये तिलावत की, मेरे गुनाहों को माफ़ कर दे और मेरी फलां परेशानी दूर कर दे,” तो अल्लाह उसकी दुआ को रद्द नहीं करता।
5. क़यामत के दिन शफाअत
कयामत का दिन, कितना खौफनाक होगा, जब न बाप बेटे का होगा, न बेटे का बाप, न भाई भाई का। हर कोई “नफसी-नफसी” (हाय मेरी जान!) पुकार रहा होगा। और उस कड़ी धूप और घबराहट में, जब कोई मददगार नहीं मिलेगा, तब कुरआन एक वकील बनकर, एक सिफरिशी बनकर आएगा। इसके बारे में हदीस में है कि
हमारे प्यारे नबी ﷺ ने फरमाया:
कुरआन पढ़ा करो, क्योंकि यह क़यामत के दिन अपने पढ़ने वालों के लिए 'शफी' (सिफारिशी) बनकर आएगा।”
(हवाला: सहीह मुस्लिम)
कुरआन अल्लाह से झगड़ेगा कि “ऐ अल्लाह! इसने रात को जागकर मुझे पढ़ा, दिन में मेरी वजह से गुनाहों से रुका रहा, आज तू इसे बख्श दे।”और अल्लाह कुरआन की सिफारिश कुबूल फरमाएगा। (मुस्लिम) हाँ, शर्त यह है कि अकीदा सही हो और हक़ूक़ुल इबाद की पामाली न हो।
6. कुरआन हिदायत की सीधी राह दिखाता है
जिंदगी में अक्सर ऐसे मोड़ आते हैं जब हम समझ नहीं पाते कि क्या सही है और क्या गलत। हम फैसलों में उलझ जाते हैं। ऐसे वक्त में कुरआन हमें रास्ता दिखाता है। यह ‘फुरकान’ है, यानी हक और बातिल में फर्क करने वाला।
अल्लाह फरमाता है:
"إِنَّ هَذَا الْقُرْآنَ يَهْدِي لِلَّتِي هِيَ أَقْوَمُ" तर्जुमा: “बेशक यह कुरआन उस रास्ते की हिदायत देता है जो सबसे सीधा और मजबूत है।” (सूरह इसरा/बनी इसराइल, आयत 9)
जो कुरआन को समझ कर पढ़ता है, उसकी अक्ल (Intellect) में अल्लाह नूर डाल देता है। उसे दुनिया की धोखेबाजी समझ आने लगती है। यही कुरआन कब्र के अंधेरे में भी रोशनी बनेगा और मुनकर-नकीर के सवालों के जवाब में हमारी मदद करेगा।

7. जहन्नुम से हिफाज़त
जहन्नुम की आग हक़ है, और उससे बचना ही असली कामयाबी है। और कुरआन की तिलावत इंसान और जहन्नुम के बीच दीवार बन जाती है। सूरह मुल्क में अल्लाह तआला ने उन लोगों का नक्शा खींचा है जो जहन्नुम में जाएंगे। वो वहां रोते हुए कहेंगे:
तर्जुमा: “अगर हम (दुनिया में अल्लाह का कलाम) सुनते और समझते, तो आज जहन्नुम वालों में न होते।”
(हवाला: सूरह मुल्क, आयत 10)
इसका मतलब साफ़ है कि अगर हम जहन्नुम से बचना चाहते हैं, तो हमें कुरआन को सुनना होगा, पढ़ना होगा और समझना होगा।और जो शख्स कुरआन को सीने से लगाकर रखता है, अल्लाह उस सीने पर जहन्नुम की आग हराम कर देता है।
8. दिल और जिस्म दोनों के लिए शिफ़ा
आजकल ऐसी ऐसी नई-नई बीमारियां आ गई हैं। जिनसे डॉक्टर्स भी हैरान हैं। लेकिन हम भूल गए कि अल्लाह ने कुरआन में शिफा रखी है। यह शिफा जिस्मानी भी है और रूहानी (Spiritual) भी।
अल्लाह का फरमान है:
"وَنُنَزِّلُ مِنَ الْقُرْآنِ مَا هُوَ شِفَاءٌ وَرَحْمَةٌ لِّلْمُؤْمِنِينَ"
तर्जुमा: “और हम कुरआन में ऐसी चीज़ें नाज़िल करते हैं जो मोमिनों के लिए शिफ़ा और रहमत हैं।”
(सूरह इसरा, आयत 82)
सूरत फातिहा को ‘सूरह शिफा’ कहा गया है। मुअव्वज़तैन (सूरह फलक और नास) पढ़कर नबी ﷺ अपने ऊपर दम किया करते थे। कुरआन पढ़कर पानी पर दम करके पीने से लाइलाज बीमारियां भी ठीक हो जाती हैं, बशर्ते कि यकीन (Yaqeen) कामिल हो।
9. दुनिया और आख़िरत दोनों की कामयाबी और भलाई
आखिरी और सबसे बड़ा फायदा यह है कि कुरआन वाला कभी नाकाम नहीं होता। चाहे वो दुनिया हो, या आखिरत। और हदीस में “सब से बेहतर” अगर किसी को बताया है तो वो है कुरआन सीखने और सिखाने वाले
रसूलुल्लाह ﷺ ने एक बेहतरीन पैमाना (Standard) दिया है:
"खैरुकुम मन तअल्लमल कुरआना व अल्लमहू"
तर्जुमा: “तुम में सबसे बेहतर वह है जो कुरआन सीखे और (दूसरों को) सिखाए।”
(हवाला: सही बुखारी)
लेकिन अफसोस है आज की सोच पर, कि हम दुनियावी तालीम (Degree) के लिए लाखों रुपये खर्च करते हैं, ट्यूशन की फीस देते हैं, लेकिन कुरआन पढ़ाने वाले उस्ताद को अगर 500-1000 रुपये देने पड़ें तो हमें भारी लगता है। यह हमारी बदनसीबी है कि हमने कुरआन को उतनी अहमियत नहीं दी जितनी दुनियावी तालीम को देते हैं और जब आदमी जिस चीज़ को अहमियत देता है तो उसी पर वक़्त और पैसा ज़्यादा ख़र्च करता है |
10. जन्नत में ऊंचे दर्जे (Ranks) हासिल करना
मेरे दोस्तों!अगर ये बात मालूम न हो तो जान लें, कि जन्नत कोई एक ही जगह नहीं है, बल्कि उसके कई दर्जे (Levels) हैं। और कुरआन पढ़ने वाला जन्नत में सबसे ऊंचे मुकाम पर होगा। हजरत अब्दुल्लाह बिन अम्र (रज़ि.) से रिवायत है कि
नबी करीम ﷺ ने फरमाया:
तर्जुमा: "कयामत के दिन 'साहिब-ए-कुरआन' (कुरआन वाले) से कहा जाएगा: 'पढ़ता जा और (जन्नत के दर्जों पर) चढ़ता जा! और उसी तरह ठहर-ठहर कर (तरतील से) पढ़, जैसे तू दुनिया में पढ़ता था। तेरा ठिकाना (Station) वही होगा जहाँ तू आखिरी आयत पढ़ेगा।'"
(अबू दाऊद, तिर्मिज़ी)
सोचिए! कुरआन की 6000 से ज्यादा आयतें हैं। जो जितनी ज्यादा तिलावत करेगा, उसका दर्जा जन्नत में उतना ही ऊंचा होता जाएगा। दुनिया में हम लिफ्ट (Lift) से ऊपर जाते हैं, लेकिन आखिरत में कुरआन की आयतें हमारी लिफ्ट बनेंगी जो हमें अर्श-ए-इलाही के करीब ले जाएंगी।
11. कुरआन घरों में बरकत लाता है
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
"अपने घरों को क़ब्रिस्तान न बनाओ, जिस घर में सूरह बक़रह पढ़ी जाती है उस घर से शैतान भाग जाता है।”
(मुस्लिम)
यहाँ से तीन बातें साबित होती हैं:
- कुरआन से शैतानी असर दूर होता है
- घर में सुकून और बरकत आती है
- घर ज़िंदा रहता है, रूहानी तौर पर
12. कुरआन क़ब्र में साथी बनेगा
हदीस का मफ़हूम: इंसान जब क़ब्र में जाता है तो उसके साथ सिर्फ़ उसके आमाल जाते हैं। कुरआन उन आमाल में शामिल होकर क़ब्र की तन्हाई में उसका साथी बनता है।
आख़िरी पैग़ाम
भाइयों और बहनों! कुरआन हमारी हिदायत है, हमारी शिफ़ा है, हमारी कामयाबी है। तो आइए, आज ही इरादा करें, कि रोज़ कुरआन पढ़ेंगे, समझेंगे, और उस पर अमल करेंगे।
अल्लाह तआला हमें कुरआन से सच्ची मोहब्बत अता फरमाए।
आमीन या रब्बल आलमीन।