Rizq Me Barkat Ka Amal : आज के दौर में शायद ही कोई ऐसा इन्सान हो जो रोज़ी, कारोबार और पैसों को लेकर परेशान न हो। कभी कर्ज़ का बोझ परेशान करता है, कभी तनख़्वाह की कमी की शिकायत रहती है, तो कभी अचानक खर्चे तोड़ देते हैं, मतलब हर इंसान किसी न किसी फ़िक्र में घिरा हुआ रहता है। और सोचता है कि कहीं से कोई हल मिल जाये जिससे मेरी मुश्किल आसान हो जाये |
तो देखिये! ऐसी कोई मुश्किल नहीं, जिसका हल अल्लाह ने ज़मीन पर उतारा नहीं, अल्लाह ने इस मुश्किल का हल भी उतारा है अगर कोई शरीअत के बताये गए तरीके पर चले तो तंगदस्ती ख़त्म हो सकती है और पहले से दौलतमंद है उसकी दौलत कभी ख़त्म नहीं हो सकती |
तो आज मैं आपको एक बहुत गहरा, और पूरी तरह मुजर्रब अमल (जिसका तजुरबा किया जा चुका है) बताने जा रहा हूँ, जिसकी बरकत से अल्लाह तआला रोज़ी के दरवाज़े खोल देता है, और वहाँ से रिज्क आने लगता है जहाँ से गुमान भी नहीं होता।
17 साल पहले की एक सच्ची कहानी
एक क़ारी साहब खुद अपना वाक़िया बयान कर रहे थे कि “बेटा, आज से 17 साल पहले मेरी हालत बहुत खराब थी। मैं मदरसे में बच्चों को कुरआन करीम पढ़ाता था, तनख़्वाह मिलती थी सिर्फ़ ₹2700।” उसमें से ₹1000 अम्मी-अब्बू को देता था। बाक़ी बचे ₹1700 में घर का पूरा निज़ाम चलाना पड़ता था।
“अब ₹1700 में घर कैसे चलता? उसका नतीजा ये होता कि हर महीने कर्ज़, फिर वही कर्ज़, फिर वही फ़िक्र…” हालात यहाँ तक पहुँच गए कि पढ़ाना छोड़ने का इरादा बना लिया। एक दिन मैंने अपने दोस्त से अपनी मुश्किल बताई तो उसने कहा “आप मेरी दुकान पर बैठ जाओ, मैं आपको पेट भर के पैसे दूँगा।”
घर वालों ने भी मशवरा दिया कि हालात बहुत तंग हैं, अब कोई और रास्ता अपनाना पड़ेगा।
आख़िरी मशवरा एक बुज़ुर्ग से
क़ारी साहब कहते हैं “मैंने सोचा, आख़िरी बार अपने बुज़ुर्ग मुफ़्ती साहब से मशवरा कर लेता हूँ देखूं वो क्या कहते हैं ” तो उनके पास जाकर मैंने पूरा हाल सुनाया और कहा कि अब पढ़ाना छोड़ना चाहता हूँ,
तो मुफ़्ती साहब ने साफ़ कह दिया: “ पढ़ाना छोड़ देना मसअले का हल नहीं है, पढ़ाने का अमल जारी रखो ।”तो क़ारी साहब बोले “हज़रत! अगर पैसों का मसला हल हो जाता तो मैं खुद नहीं छोड़ना चाहता था।”

Rizq Me Barkat Ka Amal
तब मुफ़्ती साहब ने फ़रमाया: “अच्छा, तो फिर ये 3 अमल कर लो। अल्लाह की क़सम, अगर यक़ीन के साथ कर ले जाओगे, तो रोज़ी की फ़िक्र हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।”
पहला अमल: तनख़्वाह का 2.5% अल्लाह के नाम
मुफ़्ती साहब ने कहा: “जब भी तनख़्वाह मिले, या पैसा आए फ़ौरन उसमें से ढाई फ़ीसद अल्लाह के लिए निकालना।” क़ारी साहब हैरान होकर बोले “हज़रत! पैसे वैसे ही कम हैं, उसमें से भी निकालना?”
जवाब मिला: “मशवरा लेने वाला अपनी दलील नहीं देता, मशवरा देने वाला खैरख़्वाह होता है।” (यानि मशवरा देने वाला खैरख्वाह है वो समझ रहा है हालात को इसलिए दलील न दो बल्कि बात को समझो ) तो आख़िरकार क़ारी साहब ने ढाई फ़ीसद अपनी तनख्वाह में से सदका करने कि हामी भर ली।
दूसरा अमल: 313 मर्तबा “या रज़्ज़ाक”पढ़ना
मुफ़्ती साहब ने दूसरा अमल बताया: “पूरे 24 घंटे में कभी भी 313 मर्तबा ‘या रज़्ज़ाक’ पढ़ो।” आगे और पीछे तीन-तीन मर्तबा दरूद-ए-इब्राहीम मिला लेना ।
रज़्ज़ाक अल्लाह के नामों में से एक नाम है इसका मतलब है “रिज्क देने वाला” और यह अमल अल्लाह की रहमत को खींचने वाला है। जब रहमत मुतवज्जह हो जाती है, तो रोज़ी अपने आप रास्ता बना लेती है।
तीसरा अमल: दो रकात चाश्त की नमाज़
चाश्त की नमाज़ एक नफ्ल नमाज़ है और ये दिन में 10 से 12 बजे के दरमियान दो रकात पढ़ी जाती है | लेकिन याद रहे इस मकसद से पढने के लिए…
पहली रकात में: सूरह फ़ातिहा के बाद सातवें पारे के पाँचवें रुकू की ये दुआ:
رَبَّنَا أَنْزِلْ عَلَيْنَا مَائِدَةً مِّنَ السَّمَاءِ تَكُونُ لَنَا عِيدًا لِّأَوَّلِنَا وَآخِرِنَا وَآيَةً مِّنكَ ۖ وَارْزُقْنَا وَأَنتَ خَيْرُ الرَّازِقِينَ रब्बना अंज़िल अलैना माअिदतम मिनस् समाइ, तकूनु लना ईदल लि-अव्वलिना व आख़िरिना व आयतम मिन्का, वरज़ुक़ना व अन्त खैरुर राज़िक़ीन (Surah Al-Ma'idah – 5:114)
दूसरी रकात में: सूरह फ़ातिहा के बाद 12वें पारे की पहली आयत:
وَمَا مِن دَابَّةٍ فِي الْأَرْضِ إِلَّا عَلَى اللَّهِ رِزْقُهَا وَيَعْلَمُ مُسْتَقَرَّهَا وَمُسْتَوْدَعَهَا ۚ كُلٌّ فِي كِتَابٍ مُّبِينٍ वमा मिन दाब्बतिन फिल अर्दि इल्ला अलल्लाहि रिज़्कुहा, व यअ'लमु मुस्तक़र् रहा व मुस्तौ दअहा, कुल्लुन फ़ी किताबिम मबीन (Surah Hud – 11:6)
जिसमें अल्लाह तआला ने हर मख़लूक़ की रोज़ी की ज़िम्मेदारी ली है। जिसे याद न हो, वह नमाज़ के बाद देखकर भी पढ़ सकता है।

अल्लाह ने कैसे ज़िंदगी बदल दी?
क़ारी साहब कहते हैं: “मैंने पढ़ाना नहीं छोड़ा। लेकिन इन बातों पर अमल करता रहा। अल्लाह की क़सम, धीरे धीरे हालात बदलते चले गए।” और आज 17 साल बाद हज और कई उमरे नसीब हुए, कभी रोज़ी की तंगी नहीं देखी, और अल्हम्दुलिल्लाह, शानदार घर भी अल्लाह ने अता फरमा दिया
आख़िरी पैग़ाम
मुश्किलें चाहे जितनी हों, एक मोमिन अल्लाह तआला की रहमत से मायूस नहीं होता, और इन सब के होने के बावुजूद सब्र और शुक्र को अपनाता है, तो अल्लाह तआला उसकी ज़िन्दगी में बरकत ले आते हैं और कम होने के बावुजूद उसका काम चल जाता है, और क़र्ज़ लेना नहीं पड़ता, और जो शख्स क़र्ज़े में न हो और उसकी ज़रूरतें पूरी हो रही हों, उस से ज़्यादा सुकून से ज़िन्दगी गुज़ारने वाला शायद ही कोई हो |
यह वज़ीफ़ा कोई जादू नहीं, बल्कि अल्लाह पर भरोसे, हलाल मेहनत और यक़ीन का इम्तिहान है। अगर हम अल्लाह से माँगना और उसके रास्ते में ख़र्च करना सीख जाएँ, तो अल्लाह हमारे लिए आसानी के रास्ते खोल देता है।
दुआ
अल्लाह तआला हमें बरकत वाली हलाल रोज़ी अता फरमाए, कर्ज़ और मोहताजी से महफूज़ रखेऔर तौबा व आख़िरत की तैयारी की तौफ़ीक़ दे, आमीन या रब्बल आलमीन