आज के दौर में हम शादी को अक्सर सिर्फ एक ‘इवेंट’ समझ लेते हैं, महंगे कपड़े, हॉल, दावत, फोटोशूट और रस्मों का शोर, लेकिन इन सब के बीच जो असल निकाह’ की रूह है, वो कहीं खो सी जाती है, और क्या आपने कभी संजीदगी से सोचा, कि सिर्फ कागज़ों पर दस्तखत कर देना काफी है? या निकाह की कुछ शर्तें ऐसी भी हैं जिनके बगैर निकाह सही नहीं होता?
आज हम आपको क़ुरआन व सुन्नत की रौशनी में बताएँगे कि निकाह की वो 6 बुनियादी शर्तें क्या हैं,(6 Conditions for Nikah in Islam) जो अगर पूरी नहीं की गयीं, तो ये रिश्ता जिसको आप हलाल समझ रहे हैं हराम ही रहेगा, और निकाह जिससे इबादत का सवाब मिलता, लेकिन अब गुनाहों और रुसवाई का ज़रिया बन जायेगा ।
तो अगर आप चाहते हैं कि आपके या आपके अपनों के निकाह सही हो, और निकाह में अल्लाह की रहमत और बरकत शामिल हो, तो इन 6 शर्तों को अभी समझ लें, क्यूंकि इस guide में हम वो 6 शर्तें समझेंगे जो एक निकाह को सही, मुकम्मल और अल्लाह के नज़दीक मक़बूल बनाती हैं, तो चलिए शुरू करते हैं |
6 Conditions for Nikah in Islam
आज के दौर में जब शादी के नाम पर दिखावा, महँगी रस्में, ज़्यादा हो गए हैं, तो ऐसे में ज़रूरी है कि हम वापस उसी सादगी, उसी बरकत, उसी Sunnah वाले निकाह को समझें जिसे इस्लाम ने हमें सिखाया।
और इस्लाम में निकाह कोई formal सा contract नहीं…ये तो एक मुक़द्दस एहद है, एक divine वादा, जो अल्लाह की मौजूदगी में दो रूहों को मोहब्बत, रहमत और सुकून के साथ जोड़ता है। और उलेमा कहते हैं कि निकाह ऐसा रिश्ता है जिसमें सिर्फ़ दो लोग नहीं, बल्कि दो कायनातें जुड़ती हैं।
और नबी ﷺ का फ़रमान है:
“निकाह मेरी सुन्नत है, और जो मेरी सुन्नत से रुख़ फेर ले, वह मुझसे नहीं।”
(सहीह बुख़ारी)
एक और दूसरी हदीस में
आप ﷺ ने फरमाया:
“जब इंसान निकाह कर लेता है, तो वह अपने दीन का आधा पूरा कर लेता है।”
(अल-बैहक़ी)
इसलिए निकाह को सही तरीक़े से करने के लिए 6 बुनियादी शर्तें ज़रूर ध्यान में रखें
1. दुल्हा दुल्हन की साफ़ रज़ामंदी (Mutual Consent)
इस्लाम में बिना रज़ामंदी के कोई भी शादी valid और जाएज़ नहीं होती, इसलिए लड़की और लड़का दोनों खुलकर, बगैर दबाव के अपनी मरज़ी का इजहार कर सकते हैं। क्यूंकि शादी किसी दबाव, मजबूरी या समाज की “क्या कहेंगे” वाली सोच पर नहीं टिक सकती। इसीलिए निकाह की सबसे पहली और बुनियादी शर्त है, दोनों की खुली, साफ़ और दिल से आने वाली रज़ामंदी।
लेकिन अक्सर घरों में क्या होता है कि लड़की शर्म की वजह से बोल नहीं पाती, लड़का family pressure में हाँ कर देता है, या relatives कहते हैं कि “बस कर लो, सब ठीक हो जाएगा।” लेकिन इस्लाम का नजरिया साफ़ है कि: जबरदस्ती, या मजबूरी के तहत की गई शादी इस्लाम की नज़र में जायज़ नहीं।
नबी ﷺ ने फ़रमाया:
“लड़की की इजाज़त के बगैर निकाह न किया जाए।”
(सहीह बुख़ारी)
यानि इस्लाम के मुताबिक़ लड़की से इजाज़त लेना शर्त है, favour नहीं। अब इजाज़त लेने के बारे में यहाँ पर 2 अलग अलग हुक्म हैं
| 1. बाकेरा (virgin) लड़की के बारे में | 2. तलाक़ शुदा या बेवा (वो औरत जिसकी शादी एक बार हो चुकी हो) |
| बाकेरा (virgin) लड़की की रज़ामंदी उसकी ख़ामोशी से मानी जाती है, क्योंकि अक्सर हया की वजह से वह openly नहीं बोल पाती। जैसे उससे उसके घर वालों ने पुछा “तुम्हारी शादी फ़लां से की जा रही है क्या तुम राज़ी हो” तो जवाब में वो “ख़ामोश रहे” या शरमा जाये तो मान लिया जायेगा कि वो राज़ी है | लेकिन तलाक़ शुदा या बेवा (जिसकी शादी एक बार हो चुकी हो) की रज़ामंदी साफ़ अल्फ़ाज़ में मानी जाएगी यानि वो हाँ या ना में साफ़ अल्फ़ाज़ में बोले तब माना जायेगा जायेगा कि वो राज़ी है |
इस शर्त की हिकमत क्या है?
हिकमत ये है कि निकाह जबरदस्ती से नहीं बल्कि दिल के सुकून से चलता है और अगर शादी मजबूरी पर हो जाए, तो रिश्ते में न मोहब्बत पनपती है, न इज़्ज़त, न बरकत।
नोट: अगर ज़बरदस्ती की शादी में लड़की या लड़के ने हाँ कर दिया और nikah क़बूल कर लिया तो निकाह तो हो जायेगा लेकिन ये ज़बरदस्ती करना जाएज़ नहीं है ऐसा करने वाले गुनाहगार होंगे |
लड़की या लड़के के लिए एक बहुत अहम् बात
जैसे लड़की या लड़का कहीं शादी करना चाह रहे हैं, और जवानी के जोश में उनको वही सही लग रहा है लेकिन हक़ीक़त ये है कि वो रिश्ता जोड़ का और बेहतर नहीं है, उसमे ख़राबी है और आगे चलकर मुश्किलें पेश आ सकती हैं, इसीलिए घर वाले माना कर रहे हैं तो ये उनका हक़ है, लेकिन अगर ऐसा कुछ नहीं है, तो माँ बाप या किसी रिश्तेदार को मना करना बिलकुल जाएज़ नहीं है |
2. इजाब व क़ुबूल (Proposal and Acceptance — प्रस्ताव और स्वीकार)
अब आते हैं निकाह के दिल पर, और वो है इजाब व क़ुबूल, क्यूंकि यही वो लम्हा है जब दो ज़िंदगियाँ एक मुक़द्दस एहद में बंध जाती हैं। यहीं से पता चलता है कि इस्लाम का nikah system बहुत ही सीधा है कि इसमें न कोई जटिल रस्म है, न ही कोई लंबा प्रोटोकॉल, बस साफ़ नियत और साफ़ लफ़्ज़ो में इजाब व क़ुबूल और निकाह मुकम्मल ।
इजाब व क़ुबूल Meaning
इजाब मतलब: निकाह की पेशकश (प्रस्ताव) Proposal – यानि जब लड़की या लड़के से निकाह के लिए पूछा जाये “क्या तुम्हें क़बूल है”।
क़ुबूल मतलब: Proposal का Acceptance यानि nikah की उस पेशकश को साफ़ और बुलंद आवाज़ में क़ुबूल करना “हाँ! मैंने यह निकाह क़ुबूल किया” |
और सबसे अहम बात: ये दोनों बातें एक ही मजलिस (same gathering) में, दोनों गवाहों की मौजूदगी में, साफ़-साफ़ सुनाई देनी चाहिए।
क्यों? ताकि बाद में कोई शक या confusion न रहे, और याद रहे! निकाह कोई secret transaction नहीं बल्कि यह एक खुला, एलानशुदा, honourable contract है।
मिसाल के तौर पर:
- Proposal : वली (बाप, भाई या गार्जियन) कहे: “मैं अपनी बेटी फलाँ का निकाह तुम्हारे साथ करता हूँ।” या लड़की की तरफ़ से क़ाज़ी कहे कि “फलां की बेटी तुम्हारे nikah में दी जाती है क्या तुम्हें क़ुबूल है?”
- Acceptance : दूल्हा जवाब दे: “मैं उसे क़ुबूल करता हूँ।”
बस, इस एक जुमले से, गवाहों (witnesses) की मौजूदगी में, शरई निकाह पूरा हो जाता है।
Important Note: आजकल लोग समझते हैं कि “शादी के काग़ज़ों पर sign कर दिया तो निकाह हो गया।” लेकिन इस्लामी हुक्म ये है कि असल निकाह इजाब- क़ुबूल से होता है। Documents बाद की formalities हैं, शरई निकाह की असल जान यही क़बूल करने वाला लम्हा है।
3. दो आदिल मुसलमान गवाहों की मौजूदगी (Two Muslim Witnesses)
निकाह छुपकर नहीं किया जा सकता क्यूंकि इस्लाम transparency चाहता है, ताकि शादी एक ऐलानशुदा रिश्ता हो, न कि किसी कोने में चुपके से किया गया समझौता|
नबी ﷺ ने फ़रमाया:
“बिना वली और दो गवाहों के निकाह नहीं।”
(अबू दाऊद, इब्न माजा)
लेकिन गवाहों की शर्तें क्या हैं?
इस्लामी निकाह में गवाह हर आदमी नहीं हो सकता। गवाह बनने के लिए ये चीज़ें होनी चाहिए :
- मुसलमान हों
- बालिग़ हों
- समझदार हों
- सच्चाई और ईमानदारी वाले (आदिल) हों
- इजाब–क़ुबूल को साफ़ सुनें और समझें
ये गवाह झगड़ा कराने के लिए नहीं, बल्कि शादी को शरई, और समाजी तौर पर मजबूत बनाने के लिए होते हैं।
Secret marriage (छुपकर निकाह) क्यों मना है?
कई young couples (नौजवान) सोचते हैं कि “बस हम दो लोग राज़ी हैं, निकाह हो जाए तो काफी है।” लेकिन इस्लाम secret निकाह की इजाज़त नहीं देता, क्योंकि:
- कल को अगर कोई इंकार कर दे तो सबूत नहीं बचेगा
- लड़की की हिफ़ाज़त और वली का हक़ खत्म हो जाता है
- समाज में confusion पैदा होती है
4. महर (Mahr ) का तय होना
महर को लेकर अक्सर लोगों के दिल में सवाल होते हैं,“ये शादी का बोझ है?”, “ये पैसा क्यों देना पड़ता है?”, लेकिन सच्चाई ये है कि इस्लाम में महर बोझ नहीं, ये दुल्हन का मुकम्मल और शरई हक़ है, और इसको तय किये बगैर निकाह valid और जाएज़ नहीं होता।
क़ुरआन में अल्लाह तआला का साफ़ हुक्म है:
“और औरतों को उनका महर खुशी-खुशी अदा करो।”
(क़ुरआन 4:4)
इसलिए महर न देना, या तय तो कर लिया लेकिन देने का इरादा न होना बिलकुल दुल्हन का हक़ मरना है और हक़ मरना किसी भी तरह जाएज़ नहीं, इससे निकाह में बरकत ख़त्म होगी और नहूसत आयेगी | हाँ! ये ज़रूर ध्यान रहे कि महर समाज के दिखावे के लिए न हो, और दुल्हे की हैसियत के मुताबिक़ हो |
नबी ﷺ ने फ़रमाया:
“सबसे बरकत वाली शादी वह है जिसमें बोझ कम हो।”
(अबू दाऊद)
यानी महर जितना simple, और दिल से दिया जाए, उतनी ही बरकत उतरती है। और महर 2 तरह का होता है
| Mu‘ajjal (तुरंत दिया जाने वाला) | Mu’akhkhar (बाद में दिया जाने वाला) |
| निकाह के वक्त या शादी से पहले/बाद तुरंत दिया जाता है। | जो शौहर वादा करता है कि किसी वक्त या किसी हालात में अदा करेगा। |
दोनों जाएज़ हैं, बस wife को clearly बताया जाए और दोनों तरफ़ से भी clarity हो कि महर कब अदा किया जायेगा।
Real Beauty of Mahr
महर शादी की कीमत नहीं, ये उस एहद की पहली निशानी है जहाँ एक मर्द कहता है: “मैं अल्लाह के नाम पर तुम्हें अपनी जिम्मेदारी में ले रहा हूँ” जब महर सच में दिल से दिया जाए, तो वो रिश्ता शुरू से ही बरकत और मोहब्बत से भर जाता है।
5. एक-दूसरे से शादी की इस्लामी हैसियत (Eligibility to Marry)
इस शर्त का मक़सद खून के रिश्तों और समाजी निज़ाम की हिफ़ाज़त करना है। इसलिए एक बात याद रखिये कि निकाह सिर्फ़ दिल मिल जाने का नाम नहीं कि जिससे भी दिल मिल गया बस निकाह कर लो, बल्कि निकाह से पहले यह देखना भी ज़रूरी होता है कि दोनों इस्लामी तौर पर एक-दूसरे से शादी करने के क़ाबिल हैं या नहीं।
क्यूंकि इस्लाम की नजर में कुछ रिश्ते ऐसे हैं जिनसे शादी करना हराम है, चाहे मोहब्बत हो या पसंद, और इसका मक़सद ये है कि समाज की पवित्रता बाक़ी रहे, रिश्तों की इज़्ज़त बनी रहे, और family structure महफ़ूज़ रहे। क़ुरआन में साफ़ तौर पर उन रिश्तों की लिस्ट मौजूद है जिनसे निकाह करना जाइज नहीं:
“तुम पर हराम की गईं: तुम्हारी माएँ, बेटियाँ, बहनें, फूफियाँ, खालाएँ, भतीजियाँ, भांजियाँ…”
(क़ुरआन 4:23)
और जिन रिश्तों में शादी और nikah मना है वो 3 रिश्ते हैं:
1. Blood Relations (खून के रिश्ते)
2. Marriage Relations (शादी से बने रिश्ते)
3. Foster Relations (breastfeeding / दूध के रिश्ते) यानी किसी औरत ने किसी बच्चे को दूध पिलाया,तो वह औरत उस बच्चे के लिए माँ के दर्जे पर है, और उस औरत के बच्चे भाई-बहन के दर्जे पर। मतलब अगर किसी बच्चे ने किसी महिला का दूध पिया, तो वह महिला उसकी “दूध-माँ” है, और उसके बच्चे “दूध-भाई-बहन” हैं। इनसे भी निकाह हराम है।
| 1. Blood Relations (खून के रिश्ते) में आतें हैं, जैसे: | 2. Marriage Relations (शादी से बने रिश्ते) जैसे: | 3. Foster Relations ((breastfeeding) रज़ा‘अत / दूध के रिश्ते) |
| माँ | सास | दूध पिलाने वाली औरत (माँ) |
| बेटी | सौतेली माँ | उसके बच्चे |
| बहन | step-daughters (कुछ शर्तों के साथ) | |
| बुआ | ||
| ख़ाला | ||
| भतीजी/भांजी |
इनमें से किसी से भी निकाह नहीं हो सकता, क्यूंकि ये रिश्ते हमेशा के लिए महरम हैं। और ये रिश्ते सम्मान के लिए कायम किए गए हैं, इनके साथ निकाह की कल्पना भी न की जाए।
क्यों रखी गई ये पाबंदियाँ?
इस्लाम रिश्तों को सिर्फ़ सामाजिक नहीं, रूहानी और साफ़-सुथरा रखना चाहता है। अगर महरम रिश्तों में निकाह जाइज होता, तो:
- घरों का निज़ाम बिगड़ जाता
- boundaries खत्म हो जातीं
- respect और trust का सिस्टम टूट जाता
- बच्चों की परवरिश और family dynamics गड़बड़ा जाते
इन पाबंदियों का असल मक़सद घरों में पाकीज़गी, सुकून और इज़्ज़त को बरकरार रखना है।
6. दीन और ईमान का मेल (Religious Compatibility)
इस शर्त का असर पूरे निकाह और भविष्य (Future) की नस्लों पर पड़ता है, क्यूंकि nikah सिर्फ़ दो लोगों का साथ नहीं बल्कि ये दो सोचों, और दो लाइफ़स्टाइल का मिलन है, और जब ये रिश्ता अल्लाह के नाम पर बंध रहा हो, तो दोनों के दीन और मज़हब में मेल जोल ज़रूर हो, यानि शादी ऐसे शख्स से हो जो दीने इस्लाम का पाबंद हो।
क़ुरआन कहता है:
“मुशरिक औरतों से निकाह न करो जब तक वह ईमान न ले आएँ… और अपनी औरतों का
निकाह भी मशरिक़ मर्दों से न करो जब तक वह ईमान न लाएँ।”
(क़ुरआन 2:221)
ये आयत हमें समझाती है कि शादी का असली मक़सद सिर्फ़ साथ रहना नहीं, बल्कि एक ऐसा घर बनाना है जहाँ ईमान, तक़वा, और इबादत का माहौल हो।
दीन में हम-आहंगी क्यों ज़रूरी है?
1.घर में सुकून और एक जैसी सोच: जब पति-पत्नी दोनों का दीन (Religion) एक जैसा होता है, तो उनकी प्राथमिकताएँ (priorities) भी एक होती हैं । इससे घर में हलाल-हराम या रहन-सहन को लेकर झगड़े नहीं होते और सुकून बना रहता है ।
2. बच्चों की इस्लामी परवरिश आसान हो जाती है: बच्चे वही सीखते हैं जो घर में चलता है। अगर दोनों parents दीनदार हों, तो बच्चों की spiritual foundation खुद-ब-खुद मजबूत होती चली जाती है।
3. मज़हबी टकरावों से बचाव होता है: अगर दीन अलग हों, तो सोचना अलग, खाना अलग, त्योहार अलग-और फिर दिलों के बीच invisible दीवारें खड़ी हो जाती हैं। इसलिए इस्लाम चाहता है कि निकाह एक ऐसा रिश्ता बने जिसमें spiritual harmony हो, न कि spiritual conflict।
Real-Life Note
बहुत दफा शादी सिर्फ़ looks, पैसे या feelings पर कर दी जाती है, लेकिन असली compatibility lifestyle और belief से बनती है। अगर मज़हबी base एक हो, तो खुशियाँ भी दुगनी होती हैं और मुश्किलें भी आसान।
Conclusion
निकाह सिर्फ़ दो लोग नहीं, दो दुआएँ, दो उम्मीदें, दो ख़्वाब, और दो परिवारों का मिलन है। और इस्लाम ने इन 6 शर्तों को इसलिए रखा है कि यह रिश्ता मजबूरी नहीं, मोहब्बत बने…दिखावा नहीं, बरकत बने…formalities नहीं, इबादत बने।
और जब निकाह Qur’an और Sunnah के मुताबिक़ होता है, तो अल्लाह उस रिश्ते में ऐसी रहमत डाल देता है, जिसे न पैसे से खरीदा जा सकता है, न दुनिया की किसी planning से।
अल्लाह हर उस घर को सुकून, मोहब्बत और रहमत से भर दे जहाँ निकाह उसकी शर्तों के मुताबिक़ किया गया हो।
आमीन।
पोस्ट से कुछ सवालात | FAQ
1. क्या सिर्फ़ क़ुबूल है कह देने से निकाह हो जाता है?
हाँ, लेकिन दो condition के साथ
गवाह मौजूद हों + इजाब–क़ुबूल एक ही मजलिस में हो।
सिर्फ़ फोन पर या चुपके से कह देने से शरई निकाह पूरा नहीं होता।
2. क्या लड़की की खामोशी भी रज़ामंदी मानी जाती है?
बाकेरा (virgin) लड़की अगर शर्म की वजह से चुप रहे तो उसकी खामोशी रज़ामंदी मानी जाती है, लेकिन पहले से शादीशुदा औरत (बेवा, तलाकशुदा) को साफ़ लफ़्ज़ों में हाँ बोलना ज़रूरी है।
3. महर कितने का होना चाहिए?
इस्लाम quantity नहीं देखता, sincerity देखता है। महर उतना ही हो जो husband आसानी से, खुशी से दे सके। नबी करीम ﷺ ने कहा: बरकत उसी निकाह में है जिसमें बोझ कम हो।
4. क्या चुपचाप (secret nikah) जाइज है?
नहीं, इस्लाम निकाह को एलानशुदा रिश्ता बनाना चाहता है, इसलिए दो गवाहों की मौजूदगी जरूरी है। Hidden marriages बाद में confusion और disputes पैदा करते हैं।
5. क्या बिना महर के शादी हो सकती है?
नहीं, महर निकाह की एक शर्त है। हाँ, amount बातचीत करके बाद में भी तय किया जा सकता है, लेकिन महर का concept मौजूद होना जरूरी है।
6. किन रिश्तों से निकाह हराम है?
माँ, बेटी, बहन, बुआ, ख़ाला, भतीजी, भांजी, सास, सौतेली माँ, और दूध-माँ और उसके बच्चे, इनसे शादी हमेशा हराम है। क़ुरआन 4:23 में पूरी लिस्ट मौजूद है।
7. क्या दीन में फर्क निकाह में परेशानी लाता है?
जी हाँ, जब दो लोगों की दीनदारियाँ अलग हों, तो priorities भी अलग हो जाती हैं, जिससे घर में tension पैदा होती है। इसीलिए इस्लाम दीन में हम-आहंगी को बहुत अहमियत देता है।
8. क्या सिर्फ़ काग़ज़ों पर sign करने को निकाह माना जाता है?
नहीं, काग़ज़ legal पार्ट है, लेकिन शरई निकाह इजाब–क़ुबूल और गवाहों से होता है।
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