Tahajjud Ki Namaz ka tarika | तहज्जुद की नमाज़ का तरीक़ा

रात की ख़ामोशी, और नींद में डूबी सारी दुनिया और ऐसे में एक अल्लाह का बंदा बिस्तर छोड़कर मुसल्ले पर खड़ा हो जाए, और अपने रब की राज़ी करने लग जाये, ये होती है तहज्जुद की नमाज़। और यह कोई आम नफ़्ल इबादत या नमाज़ नहीं, बल्कि अल्लाह से ख़ास मुलाक़ात का वक़्त है। लेकिन अफ़सोस, कि बहुत से लोग नहीं जानते कि tahajjud ki namaz ka tarika क्या है, कैसे पढ़ी जाए |

तो अगर आप अल्लाह से क़रीबी रिश्ता चाहते हैं। तो आपको रात के उस पहर उसे पुकारना होगा यानि tahajjud ki namaz  अदा करनी होगी, अब अगर आप नहीं जानते कि tahajjud Kaise Padhen तो यहाँ आपको क़ुरआन और हदीस की रोशनी में tahajjud के सारे सवालों के जवाब मिल जायेंगे |

“तहज्जुद” अरबी ज़बान का लफ़्ज़ है इसका मतलब होता है “नींद तोड़कर जागना” या “रात को बेदार होना”। चूँकि यह नमाज़ रात को सो कर उठने के बाद पढ़ी जाती है, इसीलिए इसे नमाज़-ए-तहज्जुद कहा जाता है। यह नफ़्ल नमाज़ों में सबसे अफ़ज़ल (बेहतरीन) नमाज़ मानी जाती है।

तहज्जुद की फ़ज़ीलत का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि कुरआन और हदीस में फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद सबसे ज़्यादा मर्तबा इसी नमाज़ का बताया गया है।

कुरआन मजीद में अल्लाह तआला ने फ़रमाया:

"और रात के कुछ हिस्से में तहज्जुद पढ़ा करो, यह तुम्हारे लिए नफ़्ल (अतिरिक्त इबादत) है। 
करीब है कि तुम्हारा रब तुम्हें 'मक़ाम-ए- महमूद' (तारीफ़ के काबिल मक़ाम) पर फ़ायज़ करे।"

(सूरह अल-इसरा: 17:79)

यानी तहज्जुद इंसान को आम मोमिन से ख़ास बंदा बना देती है।

हदीस शरीफ़: रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया: 

"फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद सबसे अफ़ज़ल नमाज़ 'रात की नमाज़' (तहज्जुद) है।"

(सहीह मुस्लिम)

एक और हदीस में आता है कि

रात के आख़िरी पहर अल्लाह तआला आसमान-ए-दुनिया पर तशरीफ़ लाते हैं और फ़रमाते हैं: 

"है कोई मुझसे माँगने वाला कि मैं उसे अता करूँ? है कोई बख़्शिश माँगने वाला कि मैं उसे बख़्श दूँ?"

(बुख़ारी व मुस्लिम)

यह नमाज़ चेहरे पर नूर और दिल में सुकून पैदा करती है।

वक़्त शुरू होता है: ईशा की नमाज़ पढ़ने और उसके बाद सो कर उठने के बाद।

अफ़ज़ल (बेहतरीन) वक़्त: रात का आख़िरी तीसरा हिस्सा (Last Third of the Night)। यानी फ़ज्र की अज़ान से 1-2 घंटे पहले का वक़्त सबसे बेहतरीन है।

वक़्त ख़त्म होता है: जब ‘सुबह सादिक’ हो जाए यानी फ़ज्र का वक़्त शुरू होते ही तहज्जुद का वक़्त ख़त्म हो जाता है।

रात का आख़िरी तिहाई (Last One Third of Night)

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

“हर रात जब आख़िरी तिहाई बचती है, 
हमारा रब आसमान-ए-दुनिया पर उतर आता है और फ़रमाता है:
‘कौन है जो मुझसे दुआ करे कि मैं क़ुबूल करूँ?
कौन है जो मुझसे माँगे कि मैं दूँ?
कौन है जो मुझसे माफ़ी चाहे कि मैं माफ़ कर दूँ?’”

(सहीह बुख़ारी 1145, सहीह मुस्लिम 758)

सोचिए…
जिस वक़्त राजा दरबार लगाता है,उसी वक़्त हम सोए रहें?

क्या तहज्जुद के लिए सोना ज़रूरी है? (अहम सवाल)

जी हाँ, “तहज्जुद” के लफ़्ज़ी माने ही “नींद से जागने” के हैं, ज़्यादातर उलेमा के नज़दीक

तहज्जुदक़याम-उल-लैल
तहज्जुद के लिए इशा के बाद कम से कम थोड़ी देर सो कर उठना शर्त है।अगर आप बिना सोए पूरी रात नमाज़ पढ़ते हैं तो उसे “क़याम-उल-लैल” (रात की नमाज़) कहा जाएगा, उसका भी बहुत सवाब है, मगर वह तकनीकी तौर पर “तहज्जुद” नहीं होगी।

बेहतर यही है कि पहले थोड़ा सो लिया जाए, फिर उठा जाए ताकि जिस्म में थोड़ी चुस्ती आ जाये। लेकिन अगर कोई नहीं सो पाया, और रात में उठकर नफ़्ल पढ़ ले, तो नफ़्ल का सवाब तो मिलेगा। लेकिन तहज्जुद की रूह सोकर उठने में ही है।

तहज्जुद की नमाज़ में रकातों की तादाद फिक्स नहीं है, आप अपनी ताक़त के मुताबिक जितना आसानी और चुस्ती के साथ पढ़ सकें पढ़ लें : बस ये ध्यान रखें कि 2-2 रकात करके पढ़ी जाए।

  • कम से कम: 2 रकात।
  • बेहतरीन (सुन्नत): 8 रकात।
  • ज़्यादा से ज़्यादा: 12 रकात या उससे भी ज़्यादा पढ़ सकते हैं।

रसूलुल्लाह ﷺ अक्सर 8 रकअत + 3 वित्र पढ़ते थे।

हदीस: 

“नबी ﷺ की रात की नमाज़ ग्यारह रकअत से ज़्यादा नहीं होती थी।”

(सहीह बुख़ारी 1147)

नियत दिल के इरादे का नाम है। अगर आप रात को अलार्म लगाकर सोए हैं, तो वह भी एक नियत ही है। लेकिन ज़बान से कहना चाहें तो यूँ कहें: “नियत करता हूँ मैं 2 रकात नमाज़ नफ़्ल तहज्जुद, वास्ते अल्लाह तआला के, रूख मेरा काबा शरीफ़ की तरफ।”

Tahajjud Ki Namaz ka tarika

यह बात भी समझ लें कि तहज्जुद की नमाज़ में कोई एक सूरह तय नहीं है। लेकिन रसूलुल्लाह ﷺ से कुछ ख़ास सूरतें सहीह हदीसों में साबित है, जिन्हें पढ़ना अफ़ज़ल है।

हज़रत हुदैफ़ा (रज़ि.) फ़रमाते हैं: 
“मैंने एक रात रसूलुल्लाह ﷺ के साथ नमाज़ पढ़ी। आपने सूरह अल-बक़रह शुरू की, फिर
सूरह अन-निसा, फिर सूरह आले-इमरान पढ़ी।”
(सहीह मुस्लिम: 772)

इससे मालूम हुआ कि: तहज्जुद में लम्बी सूरहें पढ़ना सुन्नत है, लेकिन तिलावत इत्मिनान, और ठहराव के साथ हो लेकिन अगर किसी को इतनी लम्बी सूरहें याद न हों, तो घबराने की ज़रूरत नहीं। ये छोटी सूरतें भी पढ़ी जा सकती हैं |

  • सूरह अल-इख़लास
  • सूरह अल-फ़लक
  • सूरह अन-नास
  • सूरह अल-काफ़िरून
  • सूरह अल-अस्र
  • सूरह अद-दुहा
  • सूरह अल-इनशिराह
  • वुज़ू करने के  बाद पाक साफ़ जगह पर खड़े हो जाएं।
  • 2-2 रकात करके नमाज़ पढ़ें।
  • हर रकात में सूरह फ़ातिहा के बाद कुरआन की कोई भी सूरह पढ़ें। (अगर लम्बी सूरह याद हों तो वह पढ़ना अफ़ज़ल है, वरना छोटी सूरह भी काफी हैं)।
  • रुकू और सज्दे में तस्बीह इत्मीनान और सुकून से अदा करें।

नोट: अगर आपने इशा के साथ ‘वित्र’ की नमाज़ नहीं पढ़ी थी, तो तहज्जुद के बाद आख़िर में वित्र पढ़ लें। क्योंकि हदीस में है: “अपनी रात की आख़िरी नमाज़ वित्र को बनाओ।”

तहज्जुद में उठने के लिए टिप्स

अक्सर नियत तो होती है मगर आँख नहीं खुलती। इसके लिए:

  1. रात को जल्दी सोएं।
  2. सोते वक़्त तहज्जुद की पक्की नियत करके सोएं।
  3. दाहिनी करवट (Right side) लेटें और नींद की दुआ पढ़ कर सोएं।

तहज्जुद के वक़्त दुआ की कबूलियत के चांस बहुत ज़्यादा होते हैं। इसलिए नमाज़ के बाद अल्लाह से खूब गिड़गिड़ा कर दुआ मांगें। उस वक़्त यह दुआ (सैय्यदुल इस्तिग़फ़ार) ख़ूब पढ़ें:

اللَّهُمَّ أَنْتَ رَبِّي لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ، خَلَقْتَنِي وَأَنَا عَبْدُكَ...

Translation:

“ऐ अल्लाह! तू ही मेरा रब है, तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। तूने मुझे पैदा किया और मैं तेरा बंदा हूँ… ऐ अल्लाह मुझे माफ़ फ़रमा क्योंकि तेरे सिवा गुनाहों को माफ़ करने वाला कोई नहीं।”

तहज्जुद में कौन-सी दुआ सबसे बेहतर है?

कोई तय दुआ नहीं, लेकिन हिदायत, गुनाहों की माफ़ी, दिल का सुकून, औलाद और रिज़्क़ की बरकत ज़रूर माँगें:

  • चेहरे का नूर: जो लोग रात के अंधेरे में अल्लाह के सामने खड़े होते हैं, अल्लाह उनके चेहरों को दिन में रोशन कर देता है।
  • सेहत: सुबह सवेरे उठना और ताज़ा हवा में सांस लेना जिस्मानी बीमारियों को दूर करता है।
  • मसलों का हल: अगर आप किसी परेशानी में हैं, तो तहज्जुद के वक़्त मांगी गई दुआ तीर की तरह काम करती है।

अल्लाह हमें और आपको तहज्जुद का पाबंद बनाए। (आमीन)

Q1: क्या तहज्जुद के लिए पहले सोना ज़रूरी है?

जैसा कि ऊपर बताया गया, ‘तहज्जुद’ का मतलब ही ‘नींद तोड़कर उठना’ है। ज़्यादातर उलेमा के नज़दीक, इशा के बाद थोड़ी देर सो कर उठना इसके लिए अफ़ज़ल है। लेकिन अगर किसी वजह से आप सो नहीं पाए और ईशा के बाद नफ़्ल नमाज़ पढ़ ली, तो वह “क़याम-उल-लैल” (रात की नमाज़) कहलाएगी और उसका भी बहुत सवाब है। मगर ख़ास ‘तहज्जुद’ का सवाब सोने के बाद उठने में ही है।

Q2: अगर कोई 5 वक़्त की फ़र्ज़ नमाज़ नहीं पढ़ता, तो क्या वह तहज्जुद पढ़ सकता है?

तहज्जुद एक नफ़्ल (Optional) इबादत है, लेकिन 5 वक़्त की नमाज़ फ़र्ज़ (Compulsory) है। अगर कोई फ़र्ज़ छोड़कर सिर्फ़ तहज्जुद पढ़ता है, तो यह ऐसा ही है जैसे कोई “असल रकम गँवा कर मुनाफ़े (Profit) के पीछे भागे।

लेक़िन, अगर किसी को तहज्जुद की तौफ़ीक़ मिल रही है तो उसे ज़रूर पढ़े, और अल्लाह से दुआ करे कि वह उसे 5 वक़्त की नमाज़ का भी पाबंद बना दे। इबादत का दरवाज़ा कभी बंद नहीं करना चाहिए।

Q3: क्या इसे रोज़ाना पढ़ना ज़रूरी है?

रोज़ाना पढ़ना बहुत अच्छी बात है, क्योंकि “अल्लाह को वह अमल ज़्यादा पसंद है जो लगातार किया जाए, चाहे थोड़ा ही क्यों न हो।” लेकिन अगर आप रोज़ नहीं उठ पाते, तो हफ़्ते में एक-दो बार या जब भी आँख खुले, पढ़ लिया करें।

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