Azan Kya Hai? अज़ान की शुरुआत कब, और कैसे हुई

अज़ान – एक आवाज़, जो कानों से गुज़र कर दिल तक उतर जाती है

अज़ान (Azan) हम रोज़ सुनते हैं, लेकिन अक्सर उसे एक आदत की तरह सुन कर आगे बढ़ जाते हैं। और बहुत कम लोग ऐसे हैं, जो रुक कर यह सोचते हैं, कि यह आवाज़ आई क्यों है? इसकी शुरुआत कब और कहाँ हुई? और सबसे अहम सवाल, अज़ान आखिर चाहती क्या है हमसे?

तो आज की इस पोस्ट में हम ने कोई सख़्त नसीहत नहीं की, और न ही कोई भारी दीनी बहस, बल्कि डेली 5 बार loudspeaker से आने वाली अज़ान पर बात करेंगे, कि अज़ान क्या है (Azan Kya Hai?) कहाँ से आई, और क्यों आज भी उतनी ही ज़रूरी है जितनी 1400 साल पहले थी।

अज़ान का मतलब है पुकारना, बुलाना, लेकिन इस्लाम में अज़ान सिर्फ़ किसी को आवाज़ देने का नाम नहीं है, बल्कि यह नमाज़ की दावत है, और उससे भी आगे बढ़कर अल्लाह की तरफ़ बुलावा है।

जब आप अज़ान के अल्फ़ाज़ पर गौर करके देखेंगे, जैसे अल्लाहु अकबर…इसका मतलब सिर्फ़ यह नहीं है कि अल्लाह बड़ा है, बल्कि यह हमें याद दिलाता है कि तुम्हारी ज़िंदगी की हर परेशानी, हर डर, हर तनाव से अल्लाह ज़्यादा बड़ा है।

क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाते हैं कि नमाज़ इंसान को बे-हयाई और बुराई से रोकती है (सूरह अल-अन्कबूत 29:45)। लेकिन नमाज़ तक पहुँचाने वाला पहला क़दम क्या है? अज़ान। यानी अज़ान उस रास्ते का दरवाज़ा है, जो इंसान को अल्लाह से जोड़ता है।

ये ध्यान रहना चाहिए कि अज़ान की शुरुआत मक्का में नहीं, मदीना मुनव्वरा में हुई। और उसका वाकिया ये है कि जब नबी करीम ﷺ ने मक्का से मदीना हिजरत की, तो मुसलमानों की तादाद बढ़ने लगी और नमाज़ जमाअत से पढ़ी जाने लगी, तब एक प्रॉब्लम सामने आई कि नमाज़ के वक़्त एक साथ सबको कैसे जमा किया जाए?

क्यूंकि उस दौर में न तो कोई घड़ी थी, न लाउडस्पीकर, और न ही मोबाइल का अलार्म। कभी लोग अपने-अपने अंदाज़ से वक़्त का अंदाज़ा लगाते थे, तो कभी देर भी हो जाती थी, और कभी कोई रह भी जाता। यही वो लम्हा था जब इस्लाम ने एक ऐसे निज़ाम की ज़रूरत महसूस की, जो सबके लिए एक जैसा हो ।

Azan Kya Hai?

रसूलुल्लाह ﷺ ने सहाबा से मशवरा किया कि नमाज़ के वक़्त सारे मुसलमानों को कैसे इकठ्ठा किया जाये, तो कुछ लोगों ने कहा: ईसाइयों की तरह घंटी बजा दी जाए, और कुछ ने कहा: यहूदियों की तरह नरसिंगा (horn) बजा दिया जाए। लेकिन नबी करीम ﷺ का दिल इन तजवीज़ों पर मुतमइन नहीं हुआ, क्यूंकि इस्लाम किसी और क़ौम की नकल नहीं, बल्कि अपनी अलग पहचान चाहता है, इसलिए उस दिन कोई फ़ैसला न हो सका|

फिर एक सहाबी, जिनका नाम अब्दुल्लाह बिन ज़ैद (रज़ियल्लाहु अन्हु) था, उन्होंने ख़्वाब में देखा कि एक फ़रिश्ता उन्हें नमाज़ के अल्फ़ाज़ सिखा रहा है। जब उन्होंने यह ख़्वाब नबी करीम ﷺ को सुनाया, तो आपने फ़रमाया कि यह ख़्वाब हक़ है (सहीह बुख़ारी)।

यहाँ एक बहुत बारीक लेकिन गहरी बात छुपी है। अल्लाह चाहते तो सीधे वही के ज़रिये अज़ान के अल्फ़ाज़ उतार देते। लेकिन उन्होंने सहाबा के ख़्वाब को ज़रिया बनाया, ताकि उम्मत यह समझे कि इस दीन में इंसान की शिरकत और इज़्ज़त भी शामिल है।

फिर नबी करीम ﷺ ने हज़रत बिलाल (रज़ियल्लाहु अन्हु) को यही अज़ान के अल्फ़ाज़ बुलंद आवाज़ में देने का हुक्म दिया, क्योंकि उनकी आवाज़ में क़ुदरती ताक़त और असर था।

सोचिए, एक ग़ुलाम से आज़ाद हुए सहाबी को इस्लाम की सबसे बुलंद पहचान सौंप दी गई, यह इस्लाम का इंसाफ़ और करम नहीं तो और क्या है?

अब सबसे अहम सवाल पर आते हैं कि अज़ान ही क्यों दी गई? अगर सिर्फ़ नमाज़ का वक्त बताना मक़सद होता, तो कोई और आसान तरीका भी हो सकता था। लेकिन इस्लाम ने अज़ान को चुना, क्यूंकि अज़ान उसी ग़फ़लत को तोड़ने की आवाज़ है।

सूरह अल-जुमुआ (62:9) में अल्लाह फरमाते हैं (मफ़हूम):

जब नमाज़ के लिए पुकारा जाए, तो अल्लाह के ज़िक्र की तरफ़ दौड़ो और कारोबार छोड़ दो।

यहाँ “पुकारा जाए” यानि अज़ान, इंसान को यह एहसास दिलाती है कि ज़िंदगी सिर्फ़ रोज़ी, पैसा और ज़िम्मेदारियों का नाम नहीं, बल्कि रब से रिश्ता भी उतना ही ज़रूरी है।

अज़ान तो डेली सुन सुन कर आपको याद हो ही गयी होगी, लेकिन क्या आपने कभी अज़ान के अल्फ़ाज़ पर इत्मिनान से ग़ौर किया है? अगर नहीं किया तो चलिए आज करते हैं, यक़ीनन अज़ान का हर जुमला एक पैग़ाम है.

 اللهُ أَكْبَرُ اللهُ أَكْبَرُ
Allāhu Akbar, Allāhu Akbar
अल्लाहु अकबर

यह इंसान को सीधा दिल से जोड़ देता है। जैसे कहा जा रहा हो: “जो भी तुम्हें परेशान कर रहा है, वह अल्लाह से बड़ा नहीं।”

أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلٰهَ إِلَّا اللهُ
Ash-hadu an lā ilāha illallāh
अशहदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाह

यह याद दिलाता है कि ज़िंदगी में सबसे बड़ा सच क्या है।

أَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللهِ
Ash-hadu anna Muḥammadan Rasūlullāh
अशहदु अन्ना मुहम्मदुर रसूलुल्लाह

यानि अल्लाह तक पहुँचने का सब से सही रास्ता कौन सा है: हज़रत Muhammad ﷺ की सुन्नत और तालीम।

 حَيَّ عَلَى الصَّلَاةِ      حَيَّ عَلَى الْفَلَاحِ
Ḥayya ‘alaṣ-Ṣalāh | Ḥayya ‘alal-Falāḥ
हय्या अलस्सलाह / हय्या अलल-फलाह

 नमाज़ की तरफ़ आओ, कामयाबी की तरफ़ आओ। यह बहुत गहरी बात है कि दुनिया हमें कामयाबी कहीं और बताती है, लेकिन अज़ान हमें असली फलाह (कामयाबी) की तरफ़ बुलाती है।

اللهُ أَكْبَرُ اللهُ أَكْبَرُ
Allāhu Akbar, Allāhu Akbar

لَا إِلٰهَ إِلَّا اللهُ
Lā ilāha illallāh

फिर आख़िर में दोबारा अल्लाहु अकबर और ला इलाहा इल्लल्लाह, ताकि इंसान नमाज़ में दाख़िल होने से पहले दिल से सब कुछ निकाल दे।

सोचिए, दुनिया के किसी भी कोने में हों, अज़ान के अल्फ़ाज़ वही रहते हैं। न भाषा बदली, न पैग़ाम बदला। यही इस्लाम की यक़सां पहचान है। और अज़ान का निज़ाम इसलिए ख़ास है क्योंकि:

  • यह रोज़ाना पाँच बार इंसान को अल्लाह से जोड़ती है
  • यह मस्जिद को सिर्फ़ इमारत नहीं, ज़िंदा मरकज़ बनाती है
  • यह इबादत को निजी नहीं, समाजी बनाती है

और सबसे ख़ूबसूरत बात – अज़ान इंसान देता है, लेकिन दावत अल्लाह की होती है।

अज़ान की शुरुआत एक ज़रूरत से हुई थी, लेकिन उसका पैग़ाम क़यामत तक के लिए है। यह सिर्फ़ नमाज़ का एलान नहीं, बल्कि हर रोज़ इंसान को उसकी असल पहचान याद दिलाने की पुकार है। अगली बार जब अज़ान सुनें, तो सिर्फ़ कानों से नहीं, दिल से सुनिए। शायद वही लम्हा आपकी ज़िंदगी का सबसे सच्चा लम्हा बन जाए।

अब सवाल यह नहीं कि अज़ान क्यों दी जाती है, सवाल यह है,  क्या हम आज भी उसके बुलावे को उसी एहसास से सुनते हैं?

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