क्या आपने कभी गौर किया…कि अल्लाह तआला ने अपनी किताब यानि क़ुरआन को किसी हुक्म, डर या अज़ाब से शुरू नहीं किया बल्कि इसकी शुरुआत “हम्द” से की? जब मैंने इसके अल्फ़ाज़ और मआनी को समझा, तो एहसास हुआ कि कुरआन की शुरुआत यानि सूरह अल-फ़ातिहा कोई आम सूरह नहीं, बल्कि यह बंदे और अल्लाह के बीच पहली बातचीत है। यह वो दरवाज़ा है जहाँ से कुरआन शुरू होता है और जहाँ से बंदे की हिदायत का सफ़र भी शुरू होता है।
तो आज हम इस पोस्ट Surah Al-Fatiha In Hindi Translation में इस सूरह को Aayat By Aayat तरजुमा और तशरीह से समझने कि कोशिश करेंगे, तो चलिए शुरू करते हैं
यह सूरह क्यूँ नाज़िल हुई? Shan-E-Nuzool
सूरह अल-फ़ातिहा मक्का के शुरुआती दौर में नाज़िल हुई। यह वह वक़्त था जब इंसान शिर्क, ग़फ़लत और ज़ुल्म में डूबा हुआ था। तब अल्लाह तआला ने अपने नबी ﷺ को कोई लंबी क़ानून की किताब देकर शुरुआत नहीं करवाई, बल्कि पहले दिलों को जोड़ने वाली सूरह दी। इसी लिए सूरह अल-फ़ातिहा को कहा गया:
- उम्मुल-क़ुरआन (क़ुरआन की माँ)
- सबअ-मसानी (बार-बार दोहराई जाने वाली सूरह)
क्योंकि यह सूरह पूरे कुरआन की रूह को बहुत छोटे लेकिन बहुत गहरे अल्फ़ाज़ में समेटे हुए है।
सूरह अल-फ़ातिहा का Overview
इस सूरह को अगर दिल से समझना हो, तो इसे 3 बड़े मंज़रों में देखा जा सकता है:
1. मंज़र 1: बंदा अपने रब को पहचानता है
2. मंज़र 2: बंदा अपने रिश्ते और ज़िम्मेदारी का ऐलान करता है
3. मंज़र 3: बंदा रास्ता माँगता है “हिदायत का रास्ता”

मंज़र 1: बंदा और उसका रब पहचान, रहमत और रिश्ता
(आयत 1 से 3)
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम
मैं शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से, जो बहुत मेहरबान, बार-बार रहमत करने वाला है
क़ुरआन मजीद की हर सूरह की शुरुआत (सिवाय सूरह तौबा) “बिस्मिल्ला हिर् रहमानिर् रहीम” से होती है। और यह सिर्फ़ एक जुमला नहीं, बल्कि इस्लामी ज़िंदगी का उसूल है कि हर नेक और अहम काम की शुरुआत अल्लाह के नाम से की जाए।
बिस्मिल्लाह से हर काम की शुरुआत
इस्लाम ने हमें तालीम दी है कि “हर जायज़ और भलाई वाले काम की शुरुआत अल्लाह के नाम से किया करो” रसूलुल्लाह ﷺ का अमल मुबारक यही था कि आप हर अहम काम की शुरुआत अल्लाह के ज़िक्र और “बिस्मिल्लाह”से करते थे। चाहे वो खाना हो, सोना हो, या सफ़र पर निकलना हो, वगैरा वगैरा ।
कुछ दुआएँ ऐसी हैं जो ख़ास मौक़ों पर पढ़ी जाती हैं, जैसे: लेकिन क़ुरआन की तिलावत और सूरह फ़ातिहा की शुरुआत “बिस्मिल्ला हिर् रहमानिर् रहीम” से ही की जाती है।
الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ अल्हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन सारी तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं, जो सारे जहानों का रब है
जिस तरह इंसानों का एक आलम (दुनिया) है, जिन्नातों का एक आलम (दुनिया) है, और फ़रिश्तों का एक आलम (दुनिया)है, ऐसे ही इस दुनिया में बहुत सारे अनगिनत आलम हैं, इसीलिए यहाँ पर “रब्बिल आलम” नहीं बल्कि “रब्बिल आलमीन” कहा गया, जिसका का मतलब है “तमाम जहानों” यानि इंसान, जिन्न, फरिश्ते, जानवर, ज़मीन, आसमान, सूरज, चाँद और सितारे, इन सब जहानों का रब और मालिक अल्लाह है |
और “रब” सिर्फ़ पैदा करने वाला नहीं होता, बल्कि पालने वाला, तरबियत देने वाला, सँवारने वाला, और हर ज़रूरत पूरी करने वाला होता है और हर दर्जे में तरक़्क़ी देने वाला भी होता है। इसीलिए अल्लाह तआला सिर्फ़ खालिक़ नहीं, बल्कि हर लम्हा अपनी मख़लूक़ की परवरिश कर रहा है। माँ के पेट में बच्चे की तरबियत से लेकर पूरी कायनात के निज़ाम तक सब कुछ “रब्बुल आलमीन” होने की खुली दलील है।
الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ अर-रहमानिर रहीम जो बेहद मेहरबान है, और बार-बार रहमत फरमाने वाला है
यहाँ अल्लाह तआला बंदे को सबसे पहले यह नहीं बताते कि “तुम क्या करो”, बल्कि यह बताते हैं कि “तुम किस से बात कर रहे हो।” यानि “रब्बुल आलमीन” से और “रहमान” और “रहीम” से |
“रब्बुल आलमीन” का मतलब तो जान लिया अब रहमान का मतलब है “दुनिया की आम रहमत”। यह वह रहमत है जो अल्लाह ने हर मख़लूक़ को अता की है, मोमिन हो या काफ़िर, नेक हो या गुनहगार। ज़िंदगी, सेहत, रोज़ी, हवा, पानी, औलाद और अक़्ल, ये सब “रहमान” की रहमत के असरात हैं।
जबकि “रहीम” का मतलब आख़िरत की ख़ास रहमत है, और यह रहमत सिर्फ़ मोमिन बंदों के लिए है, हमेशा रहने वाली है। दुनिया में इसका कुछ असर ज़रूर दिखता है, लेकिन इसका पूरा इनाम आख़िरत में मिलेगा। और काफ़िरों का इसमें कोई हिस्सा नहीं है |
बस इतना समझ लीजिये कि “रहमान” की रहमत आम है, और “रहीम” की रहमत ख़ास, यानि यह अल्लाह जो मालिक भी है, हाकिम भी है, वही मेहरबान भी है।
इस मंज़र से क्या सीखते हैं?
इबादत से पहले अल्लाह की सिफ़ात को समझना ज़रूरी है। जो अपने रब को नहीं पहचानता, वह नमाज़ तो पढ़ लेता है लेकिन Connection महसूस नहीं कर पाता।
Life Application / Self-Reflection
खुद से पूछिए:
- क्या मैं नमाज़ में सिर्फ़ पढ़ता हूँ या यह भी महसूस करता हूँ कि मेरा रब रहमान और रहीम है?
- क्या मैं मुश्किल में अल्लाह को सिर्फ़ सज़ा देने वाला समझता हूँ या रहमत करने वाला भी?
अगर यह एहसास पैदा हो जाए, तो नमाज़ बोझ नहीं रहती बल्कि सुकून बन जाती है।
मंज़र 2: बंदे का ऐलान – मालिक भी वही, मदद भी उसी से
मक्का के लोग बहुत सारे खुदाओं में बंटे हुए थे। कोई किसी से डरता था, कोई किसी से उम्मीद रखता था। इसीलिए अल्लाह तआला आयत न. 4 और 5 में बंदे की ज़ुबान से एक बहुत बड़ा ऐलान करवाते हैं, अब किसी और का सहारा नहीं। जब खालिक और मालिक अल्लाह है, तो अब किसी और के सामने झुकना नहीं।
مَالِكِ يَوْمِ الدِّينِ मालिकि यौमिद्दीन वह बदले के दिन का मालिक है
“मालिक” वह होता है जिसे हर तरह का इख़्तियार और क़ुदरत हासिल हो, और “यौमिद्दीन” का मतलब है “बदले का दिन” यानी क़यामत।
दुनिया में इंसान को थोड़ी-सी आज़ादी दी गई है, लेकिन आख़िरत में कोई बादशाह, कोई वज़ीर, कोई ताक़त काम नहीं आएगी। उस दिन सिर्फ़ अल्लाह तआला ही मालिक होगा। इस आयत से यह अकीदा पैदा होता है कि हर अमल का हिसाब होगा, और इंसाफ़ पूरी तरह क़ायम किया जाएगा।

إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ इय्याक नअबुदु व इय्याक नस्तईन हम सिर्फ़ तेरी ही इबादत करते हैं और सिर्फ़ तुझी से मदद माँगते हैं
यहाँ इबादत का मतलब समझ लीजिये क्यूंकि कुछ लोग इबादत का मतलब सिर्फ़ नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज ही समझते हैं, ऐसा नहीं है बल्कि इबादत का मतलब: झुकना, मानना, अल्लाह को सबसे ऊपर रखना यानि: फैसलों में, ख्वाहिशों में, डर में, उम्मीद में सबसे ऊपर सिर्फ़ अल्लाह। इसके अलावा दुआ, तवक्कुल, उम्मीद और डर भी इबादत में शामिल हैं।
और ये सारी चीज़ें सिर्फ़ अल्लाह के लिए ख़ास हैं। किसी और से ऐसी मदद मांगना जो सिर्फ़ अल्लाह ही कर सकता है, खुला हुआ शिर्क है। इसीलिए इस आयत में बंदा अल्लाह से साफ़ एलान करता है: हम सिर्फ़ तेरी ही इबादत करते हैं और सिर्फ़ तुझसे ही मदद मांगते हैं।
और यह आयत (और सिर्फ़ तुझी से मदद ) इंसान की सबसे बड़ी कमज़ोरी को छूती है, हम कहते तो हैं: “मैं अल्लाह पर भरोसा करता हूँ” लेकिन दिल में: डर किसी और का, उम्मीद किसी और से, सहारा किसी और का,इसीलिए इन आयतों में बंदा खुद को ठीक करता है और कहता है “ऐ अल्लाह! सहारा सिर्फ़ तू है।”
इस मंज़र से क्या सीखते हैं?
सच्ची इबादत सिर्फ़ सज्दे में नहीं, बल्कि भरोसे में दिखाई देती है। जो सच में अल्लाह का बंदा होता है, वह किसी और के सामने दिल से नहीं झुकता।
Life Application / Self-Reflection
खुद से ईमानदारी से पूछिए: क्या मैं सच में सिर्फ़ अल्लाह से मदद माँगता हूँ, या पहले हर दरवाज़े पर जाता हूँ और आख़िर में अल्लाह को याद करता हूँ? क्या मेरी इबादत आदत है या वफ़ादारी? अगर यह मंज़र दिल में उतर जाए, तो इंसान भीड़ में भी आजाद हो जाता है।
मंज़र 3 : “सीधा रास्ता कौन-सा है?”
मैं तेरा बंदा हूँ, मैं तुझी से मदद माँगता हूँ, लेकिन… अब चलूँ तो चलूँ किधर? क्यूंकि इंसान की सबसे बड़ी परेशानी इल्म की कमी नहीं होती, बल्कि रास्तों की उलझन होती है।और हर दौर में:
- सच और झूठ मिला हुआ
- हिदायत और गुमराही पास-पास
- नेकी और बुराई एक जैसी लगने लगती हैं
इसी लिए आयत न. 6 और 7 में अल्लाह तआला बंदे की ज़ुबान से एक ऐसी दुआ कहलवाते हैं, जो हर ज़माने में उतनी ही ज़रूरी है, जितनी पहली बार थी।
اهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيمَ इह्दिनस्सिरातल मुस्तकीम हमें सीधा रास्ता दिखा दे
यह सबसे अहम दुआ है। और सीधा रास्ता वह है जो:
- अल्लाह की रज़ा तक ले जाए
- नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तरीक़े पर हो
- गुमराही और ज़ुल्म से बचाए
यह दुआ बताती है कि इंसान को हर लम्हा हिदायत की ज़रूरत है, चाहे वह कितना ही नेक क्यों न हो।
صِرَاطَ الَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ सिरातल्लज़ीना अन‘अमता अलैहिम उन लोगों का रास्ता जिन पर तूने इनाम फरमाया
अब सवाल उठता है कि इनाम किस पर फ़रमाया, तो कुरआन जवाब देता है कि “ये लोग हैं जिन पर अल्लाह ने इनाम फ़रमाया है: नबी, सिद्दीक़, शुहदा(शहीद) और सालिहीन(नेक लोग) यही कामयाब लोग हैं,” और यही असली रोल मॉडल हैं, और इन्हीं के नक़्श-ए-क़दम पर चलना कामयाबी की ज़मानत है।
غَيْرِ الْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا الضَّالِّينَ ग़ैरिल मग़दूबि अलैहिम वलद्दाल्लीन न उन लोगों का रास्ता जिन पर ग़ज़ब हुआ और न उन का जो भटक गए
ग़ज़ब वाले (“मग़ज़ूब अलैहिम”) वो हैं जो हक़ को जानकर भी उस पर अमल नहीं करते। “दाल्लीन” वो हैं जो बिना इल्म के रास्ता चुन लेते हैं। बंदा दुआ करता है कि अल्लाह उसे दोनों से बचाए।
यह दुआ किसी गुनहगार की नहीं, बल्कि हर मोमिन की ज़रूरत है, क्योंकि रास्ता दिखना और बात है और उस पर क़ायम रहना दूसरी बात और यहाँ बंदा अपने इल्म पर नहीं, अपने अमल पर नहीं, अल्लाह की रहनुमाई पर भरोसा करता है।
Life Application / Self-Reflection
खुद से पूछिए:
- क्या मैं रोज़ यह दुआ समझकर माँगता हूँ या बस ज़ुबान से दोहराता हूँ?
- क्या मेरे फैसले सच में “सीधे रास्ते” की तरफ़ ले जाते हैं या बस आसान रास्ते की तरफ़?
अगर यह एहसास पैदा हो जाए, तो सूरह अल-फ़ातिहा सिर्फ़ नमाज़ की सूरह नहीं रहती, पूरी ज़िंदगी का नक़्शा बन जाती है।
नतीजा
सूरह अल-फ़ातिहा सिर्फ़ एक सूरह नहीं, बल्कि पूरे दीन-ए-इस्लाम का निचोड़ है: अकीदा, इबादत, अख़लाक़, दुआ और आख़िरत सब इसमें समाया हुआ है। इसी वजह से यह सूरह हर नमाज़ में पढ़ी जाती है जो इंसान इस सूरह को समझकर पढ़ ले,वह हर रकअत में नया इंसान बनकर उठता है।
ऐ अल्लाह! हमें सच पहचानने, उसे अपनाने और उस पर क़ायम रहने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।