Surah Al-Ikhlas in Hindi Translation & Explaination | सूरह अल-इख़लास

अरब में एक दौर ऐसा भी गुज़रा है जब हर तरफ शिर्क का बोल-बाला था। और इतना ज़्यादा कि लोगों ने काबा में 360 बुत (idols) रखे हुए थे। किसी के पास लकड़ी का ख़ुदा था, किसी के पास सोने (gold) का, तो किसी के पास मिट्टी का। सब को अपने अपने बुतों की इबादत किया करते थे |

ऐसे में जब रसूलुल्लाह (ﷺ) ने कहा कि “सिर्फ़ एक अल्लाह की इबादत करो,” तो लोगों के दिलों में कन्फ्यूज़न पैदा हुआ। उन्होंने सोचा, ये कैसा रब है जो दिखाई नहीं देता? उसका रंग क्या है? वो किस चीज़ से बना है? तो इसके जवाब में क़ुरआन ने कोई लम्बी बहस नहीं की और न ही दलीलें दीं बस, सिर्फ़ चार आयतों में इस सवाल का जवाब दे दिया ।

4 आयतें मतलब सूरह इख्लास, आप सोच रहे होने इतना छोटा जवाब, हाँ! जवाब छोटा ज़रूर है लेकिन…गहरा इतना है कि इंसान की पूरी सोच, अक़ीदा और ज़िंदगी ही बदल जाए। तो चलिए सूरह अल-इख़लास Surah Al-Ikhlas in Hindi Translation पोस्ट में इस सूरह की गहराई को समझते हैं।

रिवायतों में आता है कि कुछ मुशरिकीन-ए-मक्का और कुछ अहले-किताब नबी करीम (ﷺ) के पास आए और उन्होंने एक बड़ा अजीब सवाल किया:

"ऐ मुहम्मद (ﷺ)! हमें अपने रब का नसब (lineage/family tree) बताइये। वो किसका बेटा है? 
उसका बाप कौन है? वो किस चीज़ का बना है?" उसकी अस्ल क्या है?”

ये सवाल वो इसलिए कर रहे थे, क्यूंकि वो अपने ख़ुदाओं को मटेरियल से बनाते थे, इसलिए वो अल्लाह को भी वैसा ही समझ रहे थे। तो इस सवाल के जवाब में अल्लाह ने कोई फ़लसफ़ा नहीं उतारा, और न ही कोई लम्बी बहस की, बल्कि ये 4 लाइन की सूरह सूरह अल-इख़लास (Surah Al-Ikhlas) नाज़िल फ़रमाई, जो एक-तिहाई (1/3rd) क़ुरान के बराबर है।

Surah Al-Ikhlas in Hindi Translation

Surah Al-Ikhlas in Hindi Translation

सबसे पहले अल्लाह ने अपनी पहचान कराई।

ए नबी! “क़ुल” कह दीजिए। यानी ये बात छुपाने की नहीं, ये ऐलान है।

हुवल्लाहु अहद” वो अल्लाह एक है, लेकिन ये “एक” गिनती वाला एक नहीं।

आप ज़रा गौर करें कि यहाँ अल्लाह ने जब कहा कि वो “एक” है तो इस “एक” के लिए उसने लफ़्ज़ “वाहिद” (One) इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि “अहद” (The Unique One) इस्तेमाल किया। क्यों?

क्यूंकि

वाहिद का मतलब हैगिनती में (एक)। जिसके बाद दो, तीन, चार आ सकते हैं।
अहद का मतलब है “यक्ता” – ऐसा ‘एक’ जिसका कोई दूसरा हिस्सा नहीं, जिसका कोई जोड़ नहीं,

और ये वो “एक” है जिसमें:

  • कोई साझीदार नहीं
  • कोई हिस्सेदार नहीं
  • कोई बराबरी वाला नहीं
  • कोई मुक़ाबले वाला नहीं

दुनिया में हर चीज़ का दूसरा मिल जाता है। लेकिन अल्लाह वो “एक” है…जिसका कोई दूसरा नहीं। जैसे आप कह सकते हैं “मेरे पास एक (वाहिद) फ़ोन है,” लेकिन आप ये नहीं कह सकते “मेरा फ़ोन अहद है।”अहद सिर्फ़ अल्लाह की शान है। वो अपनी बादशाहत में अकेला है, उसे किसी पार्टनर की ज़रूरत नहीं। वो पूरी कायनात में Unique है।

Surah Al-Ikhlas in Hindi Translation

अब अगली आयत में अल्लाह तआला ने बताया कि वो सिर्फ़ एक ही नहीं है बल्कि समद भी है और समद का मतलब होता है : सब उसके मोहताज हैं, लेकिन वो किसी का मोहताज नहीं

“समद” अरबी ज़बान का एक बहुत पावरफुल लफ़्ज़ है। इसके दो गहरे मतलब भी हैं :

  1. वो चट्टान जिसका सहारा लिया जाए: ‘समद’ वो हस्ती है जिसके पास सब अपनी ज़रूरतें लेकर जाते हैं, लेकिन वो अपनी ज़रूरत के लिए किसी के पास नहीं जाता।
  2. जिसे भूख-प्यास नहीं लगती: ‘समद’ उसे भी कहते हैं जो अंदर से “ठोस” (solid) हो, खोखला (hollow) न हो। यानी उसे खाने की, पीने की, सोने की, या रेस्ट करने की ज़रूरत नहीं।

हम हर साँस के लिए उसके मोहताज (dependent) हैं, लेकिन वो हमारी इबादत का जरा भी मोहताज नहीं। अगर सारी दुनिया काफ़िर हो जाए, तो भी उसकी बादशाहत में एक ज़र्रा बराबर भी कमी नहीं आएगी। क्यूंकि वो बे-नियाज़ (Independent) है।

“समद” अरबी का ऐसा लफ़्ज़ है जिसका पूरा तर्जुमा किसी एक ज़बान में मुमकिन नहीं।

इस से हम ने क्या सीखा? (Practical Lessons)

  1. प्योर तौहीद (ख़ालिस रिश्ता): हम अक्सर अपनी प्रॉब्लम्स के लिए 10 लोगों के आगे हाथ फैलाते हैं और आख़िर में अल्लाह के पास आते हैं। सूरह इख़लास हमें सिखाती है: Start with Allah. क्योंकि वही “अहद” है और वही “समद” है। बाक़ी सब ज़रिये हैं, असल देने वाला वही है।
  2. दुनिया से उम्मीद ख़त्म करना: लोग “समद” नहीं हैं। लोग थक जाते हैं, बदल जाते हैं, मर जाते हैं। तो अगर आप अपना दिल लोगों से लगाएँगे कि “ये मुझे ख़ुश रखेगा,” तो आप टूट जाएंगे। अपनी उम्मीदें सिर्फ़ “समद” से जोड़िये, वो कभी आपको मायूस नहीं करेगा।

अभी तक हमने जाना कि अल्लाह एक है और बे-नियाज़/सबका सहारा है। लेकिन अब अगली आयत में उस सवाल का जवाब जानेंगे जो मक्का के मुशरिकीन ने अल्लाह के रसूल से पूछा था कि: “अल्लाह का नसब (खानदान) क्या है? वो किसका बेटा है?”

ये पूछने के पीछे एक वजह ये है कि इंसान की फ़ितरत है कि वो हर चीज़ को अपनी तरह समझता है। वो सोचता है “अगर मैं पैदा हुआ हूँ, तो ख़ुदा भी पैदा हुआ होगा। अगर मेरे बच्चे हैं, तो ख़ुदा के भी होने चाहिए।”

इसीलिए उस ज़माने में ईसाइयों (Christians) ने कहा कि ईसा (अ.स) अल्लाह के बेटे हैं, और यहूदियों (Jews) ने कहा उज़ैर (अ.स) अल्लाह के बेटे हैं, और अरब के मुशरिकीन ने तो फ़रिश्तों को ही अल्लाह की बेटियां बना दिया। तो इन तमाम ग़लत अक़ीदों (beliefs) को अल्लाह तआला ने सिर्फ़ इस छोटी सी आयत से चकनाचूर कर दिया।

Surah Al-Ikhlas in Hindi Translation

पैदा होने वाली बात अल्लाह से मेल नहीं खाती, क्यूंकि पैदा होने वाला कभी न कभी थक जाता है, और आखिर कार मर जाता है, लेकिन अल्लाह इन सब से पाक है। वो वक़्त से पहले भी था, वक़्त के बाद भी रहेगा। उसका कोई बाप नहीं, उसकी कोई औलाद नहीं, क्योंकि उसे किसी की ज़रूरत नहीं, क्योंकि वो अकेला काफ़ी है। अल्लाह ने बताया कि वो इंसान की तरह कमज़ोर नहीं है जिसे खानदान की ज़रूरत हो।

यहाँ दो बहुत गहरी बातें समझने वाली हैं:

  1. लम यलिद” (न उसने किसी को जना): यानी अल्लाह की कोई औलाद नहीं है। औलाद की ज़रूरत किसे होती है? इंसान को। क्यों?
    • ताकि मेरा नाम ज़िंदा रहे।
    • ताकि बुढ़ापे में वो मेरा सहारा बने।
    • ताकि मेरे काम में हाथ बटाए। लेकिन अल्लाह तो ‘समद’ है! न वो बूढ़ा होता है, न मरेगा, न उसे सहारे की ज़रूरत है। उसे वारिस क्यों चाहिए जब बादशाहत हमेशा उसी की रहनी है? औलाद होना ‘कमी’ और ‘हाजत’ की निशानी है, और अल्लाह हर कमी से पाक है।
  2. “व-लम यूलद” (और न वो जना गया): यानी उसका कोई बाप या माँ नहीं है। वो किसी से पैदा नहीं हुआ। क्यूंकि जो पैदा होता है, वो पहले “नहीं” होता, फिर वजूद में आता है। जो पैदा होता है, वो ख़त्म भी होता है। अल्लाह “अल-अव्वल” है और “अल-आखिर” है। वो हमेशा से है और हमेशा रहेगा।

अब आख़िरी आयत में अल्लाह ने वो बात कही जो अक़ल (intellect) को हिला देती है।

हम दुनिया में हर चीज़ की तुलना (comparison) करते हैं। एक से बेहतर दूसरा तलाश करते हैं। चाहे वो इन्सान हो, ताक़त, इल्म, या दौलत हो हर जगह comparison किया जाता है। लेकिन जब बात अल्लाह तक पहुँचती है तो क़ुरआन कहता है: यहाँ तुलना ख़त्म। और आख़िरी फ़ैसला सुना दिया।

Surah Al-Ikhlas in Hindi Translation

“अरबी में ‘कुफ़ुवन’ का मतलब होता है: “बराबरी करने वाला”, “टक्कर का”, या “Same Status” वाला। तो कुरआन यहाँ ऐलान कर रहा है: “पूरी कायनात (Universe) में कोई भी, किसी भी ऐतबार से मेरे बराबर नहीं है।”

  • न कोई ताक़त में उसकी बराबरी कर सकता है।
  • न कोई इल्म (knowledge) में उसके जैसा है।
  • न कोई फ़ैसले करने में उसके जैसा है।

हम जो भी तसव्वुर (imagination) कर लें, अल्लाह उससे अलग है, और उससे बड़ा है। अगर आप सोचें कि अल्लाह रौशनी (light) जैसा है, तो नहीं, रौशनी उसने बनाई है, वो रौशनी जैसा नहीं। उसकी कोई मिसाल (Example) ही नहीं है।

इस सूरह से हमने क्या सीखा? (Practical Lessons)

  1. अक़ीदे की सफ़ाई (Purity of Faith): इस सूरह का नाम “इख़लास” है, और इख़लास का मतलब होता है “खालिस करना” (To purify). जैसे दूध में पानी मिला हो तो वो खालिस नहीं रहता, वैसे ही अगर अल्लाह के साथ किसी और को मिला दिया जाए, तो ईमान खालिस नहीं रहता, और यहीं से शिर्क आ जाता है| और यह सूरह हमारे ईमान को फ़िल्टर (filter) करती है, शिर्क को निकाल कर फ़ेंक देती है। हमें मान लेना चाहिए कि अल्लाह सिर्फ़ एक है, और सारी ताक़तें उसके हाथ में हैं।
  2. डर और उम्मीद सिर्फ़ अल्लाह से: जब उसका कोई ‘कुफ़ु’ (बराबरी वाला) है ही नहीं, तो हम दुनिया के फ़िरऔनों और ज़ालिमों से क्यों डरें? जब हालात हमें डराएं, तो याद रखें: “इनकी कोई औक़ात नहीं, असल ताक़त सिर्फ़ अल्लाह है।”

मेरे अज़ीज़, अल्लाह हमसे सिर्फ़ एक चीज़ चाहता है और वो है “इख़लास”, यानी हमारा दिल सिर्फ़ उसके लिए धड़के। और जब हम सजदे में जाएं, तो यह एहसास हो कि हम उस “अहद” और “समद” के सामने झुके हैं जो पूरी कायनात का अकेला मालिक है।

और रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया कि यह सूरह एक तिहाई (1/3) क़ुरान है। जानते हैं क्यों? क्योंकि क़ुरान तीन हिस्सों में है:

  1. अहकाम (क़ानून/Law)
  2. क़िस्से (Stories)
  3. तौहीद (अल्लाह की पहचान)

सूरह इख़लास पूरी की पूरी ‘तौहीद’ है, इसमें न जन्नत का ज़िक्र है, न जहन्नम का, न हलाल-हराम का, सिर्फ़ और सिर्फ़ “अल्लाह” का ज़िक्र है। यहीं सूरह अल-इख़लास मुकम्मल होती है लेकिन तौहीद की ट्रेनिंग यहीं से शुरू होती है।

अल्लाह हमें अपनी सही पहचान और मारिफ़त नसीब फ़रमाए। आमीन।

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