इंसान की सबसे बड़ी ज़रूरत – पनाह
इंसान की ज़िंदगी में उसके कई दुश्मन होते हैं, कुछ तो बाहर से नज़र आते हैं, लेकिन सबसे ख़तरनाक दुश्मन तो वो होता है जो नज़र नहीं आता, बल्कि दिल के अंदर बात करता है। और सूरह अन-नास हमें उसी दुश्मन से बचने का तरीका सिखाती है। और यह सूरह हमें बताती है कि जब इंसान हर तरफ़ से घिर जाए, जब दिल परेशान हो, जब ख़्याल गंदे, मायूसी भरे या गुनाह की तरफ़ ले जाने वाले हों, तो इंसान को किसकी पनाह लेनी चाहिए।
वैसे तो सूरह नास कुरआन की आख़िरी सूरह है, लेकिन इसका पैग़ाम इंसान को सबसे बड़ी हिफ़ाज़त को बयान करता है। इस सूरह में अल्लाह तआला सिर्फ़ ये नहीं बताते कि शैतान से पनाह मांगो, बल्कि यह भी समझाते है कि शैतान किस तरह इंसान के दिल में दाख़िल होता है। तो आइये Surah An-Naas In Hindi Translation से इस राज़ का पर्दा हटाते हैं |

सूरह अन-नास क्यूँ नाज़िल हुई | शान-ए-नुज़ूल
हदीसों से मालूम होता है कि रसूलुल्लाह ﷺ पर एक यहूदी शख्स ने जादू किया था, जिसकी वजह से कुछ वक़्त के लिए आप ﷺ को बदन में सुस्ती और रोज़मर्रा के कामों में परेशानी महसूस हुई। इस मौके़ पर अल्लाह तआला ने हज़रत जिब्रील (अलैहिस्सलाम) के ज़रिये सूरह अल-फ़लक और सूरह अन-नास नाज़िल फ़रमाईं। इन दोनों सूरहों के ज़रिये अल्लाह ने अपने नबी को बताया कि हर छुपी और ज़ाहिर बुराई से अल्लाह की पनाह कैसे मांगी जाए।
यही वजह है कि इन दोनों सूरहों को मुअव्वज़तैन कहा जाता है, यानी वह सूरहें जो इंसान को हर किस्म की बुराई से अल्लाह की हिफ़ाज़त में ले आती हैं। रसूलुल्लाह ﷺ हमेशा इन दोनों सूरतों को सुबह-शाम और सोते वक़्त पढ़ा करते थे। इससे मालूम होता है कि यह सूरतें सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि ज़िंदगी की हिफ़ाज़त के लिए हैं। (सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)
पहली बात : इंसान किसकी पनाह ले?
सूरह अन-नास में साफ़ तौर पर बताया गया है कि पनाह “वस्वास” से मांगी जाती है। और वस्वास वह शैतान है, जो इंसान के सीनों (दिलों) में वस्वसा डालता है। लेकिन डरने की बात तो ये है कि यह कोई खुला दुश्मन नहीं होता, बल्कि ऐसा दुश्मन है जो इंसान के अपने ख़्याल बनकर सामने आता है, और बहकाता है। इसीलिए इन आयतों में कहा गया है कि इस दुश्मन से बचने के लिए अल्लाह की पनाह में आ जाओ |
Surah An-Naas In Hindi Translation
قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ आप कह दीजिए: मैं पनाह लेता हूँ इंसानों के रब की, مَلِكِ النَّاسِ इंसानों के बादशाह की, إِلَٰهِ النَّاسِ इंसानों के माबूद की।
यहाँ अल्लाह तआला ने एक ही बात को 3 नामों के साथ बयान किया है।
रब्बुन-नास
“मैं पनाह मांगता हूँ इंसानों के “रब” की” और रब वो होता है जो पैदा करता है, पालता है, और इंसान की छोटी-छोटी ज़रूरतों का ख़्याल रखता है। जब इंसान कमज़ोर होता है, और उसे सहारे की ज़रूरत होती है, तो अल्लाह उसे याद दिलाता है: मैं तुम्हारा रब हूँ।
मलिकुन-नास
“मैं पनाह मांगता हूँ इंसानों के “बादशाह” की, बादशाह या मालिक वो होता है जिसका हुक्म चलता है, जिसके फैसले को कोई रोक नहीं सकता। जब इंसान खुद को बेबस महसूस करता है, और जब दुनिया के लोग धोखा दे देते हैं, तो अल्लाह कहता है: मैं तुम्हारा मालिक हूँ।
इलाहुन-नास
“मैं पनाह मांगता हूँ इंसानों के माबूद की” इलाह या माबूद वो होता है जिसकी इबादत की जाए, जिसके आगे सिर्फ़ सर ही नहीं बल्कि दिल भी झुक जाये। और जब इंसान अंदर से टूट जाता है, जब दिल को सुकून चाहिए होता है, तो अल्लाह याद दिलाता है: मैं तुम्हारा माबूद हूँ।
इन आयतों से हमने सीखा कि…
• इंसान हर हाल में कमज़ोर है।
• हर परेशानी का हल इंसान के पास नहीं होता।
• असली हिफ़ाज़त सिर्फ़ अल्लाह की पनाह में है।
• पनाह मांगना कमज़ोरी नहीं, बल्कि ईमान की निशानी है।
ज़िंदगी में अमल
तो जब दिल में अजीब-अजीब ख़्याल आएँ, जब गुनाह अच्छा लगने लगे, जब मायूसी दिल पर हावी हो, तो सबसे पहले यह कहना सीखो: “मैं इंसानों के रब की पनाह लेता हूँ।” यही सूरह अन-नास की पहली सीख है।

दूसरी बात : वो कौन-सी बुराई या दुश्मन है जिससे पनाह मांगी जा रही है?
(अल-वस्वास और अल-ख़न्नास की पहचान)
अब तक हमने यह समझा कि इंसान को किसकी पनाह लेनी चाहिए। लेकिन अब सवाल उठता है कि आख़िर वो कौन है, जिससे अल्लाह हमें पनाह मांगने का हुक्म दे रहा है? क्यूंकि कुरआन बिला वजह किसी चीज़ से डराता नहीं है, इसलिए अगर यहाँ पनाह मांगने की बात आई है, तो यक़ीनन खतरा भी बहुत बड़ा है।
आयत (Arabic)
مِن شَرِّ الْوَسْوَاسِ الْخَنَّاسِ
उस बुराई से जो बार-बार वस्वसा डालती है, और फिर पीछे हट जाती है।
इस आयत में उस खामोश दुश्मन की पहचान करायी गयी है और बताया गया है कि यह दुश्मन तलवार लेकर हमला नहीं करता। और न ही चिल्लाकर बोलता है, बल्कि धीरे-धीरे दिल में बात डालता है। और कुरआन इसी को “वस्वसा” कहता है। “वस्वसा” यानी ऐसा ख्याल जो इंसान को बुराई की तरफ़ ले जाए, लेकिन उसे बुराई महसूस न होने दे।
“अल-वस्वास” का मतलब
वो जो एक बार नहीं, बार-बार आता है और बार-बार दिल में ख्याल डालता है। तो इंसान अगर आज नहीं माना, तो कल आएगा और बहकायेगा। कल नहीं माना, तो किसी और रास्ते से आएगा।
“वस्वसा” का असल मतलब क्या है?
अरबी ज़बान में वस्वसा का मतलब होता है, धीरे-धीरे, बार-बार, दिल में बात डालना। यानी शैतान न तो ज़ोर से बुलाता है, न खुले तौर पर गुनाह का हुक्म देता है।
वो बस एक ख्याल डालता है…
• अभी नहीं, बाद में तौबा कर लेना
• इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है
• अल्लाह ग़फूर है
• सब तो ऐसा करते हैं
बस इसी को वस्वसा कहते हैं।
“अल-ख़न्नास” का मतलब क्या है और शैतान को “ख़न्नास” क्यों कहा गया?
कुरआन शैतान को “अल-वस्वास और अल-ख़न्नास” कहता है, और ख़न्नास का मतलब होता है, पीछे हट जाने वाला। यानि जब इंसान अल्लाह को याद करता है, ज़िक्र करता है, और “अऊज़ु बिल्लाह” कहता है, तो यह दुश्मन और शैतान पीछे हट जाता है।
इससे यह बात समझ में आती है कि शैतान खुद ताक़तवर नहीं, बल्कि इंसान की ग़फ़लत से ताक़त पकड़ता है। और यह दुश्मन ताक़तवर नहीं है, बल्कि मौक़ा ढूंढता है।
इस आयत से हमने क्या सीखा?
• हर बुरा ख्याल हमारा नहीं होता।
• हर दिल की आवाज़ पर अमल करना सही नहीं।
• वस्वसे को पहचानना बहुत ज़रूरी है।
• अल्लाह का ज़िक्र सबसे बड़ा हथियार है।
ज़िंदगी में अमल
इसलिए जब दिल में ऐसा ख्याल आए, जो अल्लाह से दूर करे, गुनाह को हल्का दिखाए, और तौबा को टालने को कहे, तो खुद से कहो: यह मेरा अपना ख्याल नहीं, मेरा दुश्मन है। और फौरन कहो: अऊज़ु बिल्लाहि मिनश शैतानिर्रजीम।
तीसरी बात : वस्वसा कहाँ किया जाता है?
(सीनों के अंदर)
अब तक हमने यह जाना कि इंसान को किसकी पनाह माँगनी चाहिए, और किस दुश्मन से पनाह माँगनी चाहिए। अब आती है अगली बात कि यह दुश्मन हमला कहाँ करता है? क्योंकि जब तक हमला करने की जगह समझ में न आए, हिफ़ाज़त मुकम्मल नहीं हो सकती।
आयत
الَّذِي يُوَسْوِسُ فِي صُدُورِ النَّاسِ
आसान तर्जुमा : वो जो इंसानों के सीनों के अंदर वस्वसा डालता है।
इस आयत में कुरआन ने एक बहुत अहम बात बताई, कि वो दुश्मन (यानि अल-वस्वास और अल-ख़न्नास) सीनों में वस्वसा डालता है, अब यहाँ पर ध्यान देने वाली बात ये है कि अल्लाह ने यह नहीं कहा कि “वस्वसा” दिमाग़ में होता है, बल्कि कहा “सीनों” में होता है। क्योंकि इंसान के बड़े फैसले सिर्फ़ अक़्ल से नहीं होते, बल्कि दिल, नियत और ख़्वाहिश से होते हैं और शैतान इसी जगह वार करता है।
सीना क्या है?
सीना सिर्फ़ गोश्त का टुकड़ा नहीं है। बल्कि सीने में…
• दिल होता है
• नियत होती है
• ख़्वाहिश होती है
• डर और लालच होता है
और शैतान इन्हीं चीज़ों को निशाना बनाता है।

वस्वसा कैसे काम करता है?
वस्वसा कभी सीधे नहीं कहता “गुनाह कर लो।” बल्कि वो कहता है
• थोड़ी देर बाद तौबा कर लेना
• सब तो ऐसा ही करते हैं
• इससे क्या फर्क पड़ता है
• अल्लाह तो ग़फूर है
इस तरह गुनाह आसान और तौबा मुश्किल लगने लगती है।
इस आयत से हमने क्या सीखा?
• दिल की हिफ़ाज़त बहुत ज़रूरी है।
• हर ख्याल को सच मान लेना सही नहीं।
• दिल की सफ़ाई बिना ज़िक्र के मुमकिन नहीं।
• ज़िक्र करना मतलब दिल पर पहरा देना है।
इसलिए रोज़ अपने दिल को टटोला करो। देखो, कौन से ख्याल बार-बार आ रहे हैं। अगर कोई ख्याल अल्लाह से जोड़ता है तो वो रहमत है, और जो ख्याल अल्लाह से दूर करता है, वो वस्वसा है।
चौथी बात : वस्वसा डालने वाले कौन हैं?
(जिन्नों में से और इंसानों में से)
अब तक हमने यह समझा कि पनाह किससे मांगी जाती है, वो बुराई क्या है, और वह हमला कहाँ करती है। अब कुरआन आख़िरी सच्चाई बयान करता है, वो ये कि वस्वसा डालने वाला सिर्फ़ एक नहीं होता।
आयत (Arabic)
مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاسِ
आसान तर्जुमा : वो (वस्वसा डालने वाला) जिन्नों में से भी है और इंसानों में से भी।
आम तौर पर इंसान यह समझता है कि वस्वसा सिर्फ़ शैतान करता है, जो दिखाई नहीं देता। लेकिन इस आयत में कुरआन एक बहुत बड़ी सच्चाई बयान करता है: “जिन्नों में से भी और इंसानों में से भी।” यानि वस्वसा सिर्फ़ शैतान ही नहीं करता, बल्कि कभी-कभी इंसान भी इंसान को गुमराह करता है।
| इंसानी वस्वसा क्या होता है? | जिन्नी वस्वसा क्या होता है? |
| इंसानी वस्वसा वो होता है जो दोस्त, रिश्तेदार, या समाज के नाम पर आता है, और कहता है | जिन्नी वस्वसा अक्सर अकेलेपन में आता है, ख़्यालों के ज़रिये आता है, और इंसान को अंदर से तोड़ता है। |
| इतना सख़्त बनने की ज़रूरत नहीं | हर सलाह ख़ैर की नहीं होती |
| ज़माना बदल गया है | दिल की हिफ़ाज़त बहुत ज़रूरी है |
| बस, दिल साफ़ होना चाहिए | अल्लाह का ज़िक्र सबसे बड़ी ढाल है |
| सब करते हैं, तुम भी कर लो | अल्लाह की पनाह में आ जाना हर तरह के वस्वसे से महफूज़ करता है। |
जब कोई इंसानी वस्वसा आता है तो यह बातें सुनने में अच्छी लगती हैं, लेकिन दीन से दूर कर देती हैं।
इसलिए अपनी सोहबत देखो। यह देखो कि कौन तुम्हें अल्लाह के क़रीब करता है और कौन धीरे-धीरे दूर। अगर कोई बात दीन से टकराती है, चाहे वो किसी भी तरफ़ से आए उससे पनाह माँगो।
ख़ुलासा
सूरह अन-नास हमें यह सिखाती है कि इंसान हर वक़्त महफूज़ नहीं होता, लेकिन जो अल्लाह की पनाह में आ जाए, वो कभी बे-सहारा नहीं होता। अल्लाह हमें इस सूरह को समझने, पढ़ने और ज़िंदगी में उतारने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।