Surah Nasr In Hindi Translation & Explaination | सूरह अन-नस्र

ज़रा आंखें बंद करें, और तसव्वुर करें उस अज़ीम शख्सियत का, जिन्होंने पिछले 23 सालों में क्या कुछ नहीं सहा। कभी ताइफ़ के पत्थर खाए, कभी अपने ही शहर मक्का से निकलना पड़ा, कभी ‘शिअब-ए-अबी तालिब’ की घाटी में भूख से पेट पर पत्थर बांधे, और कभी दुश्मनों की तलवारें हर तरफ थीं ।

लेकिन आज… आज मंज़र बदल चुका है। मक्का फ़तह हो चुका है और सारे अरब में इस्लाम फैल चूका है, और एक ‘ Happy Ending’ हो चुकी है। लेकिन फिर, ऐसा क्या हुआ कि इस खुशी के बावुजूद सहाबा रोने लगे|

जी हाँ, फ़तह मक्का के बाद की ये हैरत अंगेज़ स्टोरी अगर नहीं जानते है, तो चलिए, आज हम इस पोस्ट Surah Nasr In Hindi Translation & Explaination में इस राज़ से पर्दा हटाएंगे।

सब से पहले जान लीजिये कि ये सूरत तब नाज़िल हुई जब मक्का फतह हो चुका था, और सारे अरब में इस्लाम फैल चुका था। और 23 साल की मेहनत… ताने… ज़ुल्म… हिजरत… जंग… सब्र… दुआ…के बाद मक्का, जो कभी दुश्मनी का मरकज़ था, अब इस्लाम का गढ़ बन गया था। और वो लोग जो कभी रसूलुल्लाह (ﷺ) को मारने के लिए ढूंढते थे, आज वही लोग सर झुकाए हुए इस्लाम क़बूल कर रहे थे।

लेकिन हज़रत अब्बास (रज़ि) और हज़रत अबू बक्र (रज़ि) जैसे कुछ बुज़ुर्ग सहाबा इसे सुनकर रोने लगे। क्यों? क्योंकि वो समझ गए थे कि अगर “मिशन पूरा” हो गया है, इसका मतलब है कि अब “मिशन वाले (Prophet ﷺ)” के जाने का वक्त आ गया है। तो चलिए शुरू करते हैं पहली आयत…

Surah Nasr In Hindi Translation

यहाँ पर (इज़ा) कहा गया है जिसका मतलब होता है “जब”। ध्यान दीजियेगा यहाँ पर अल्लाह ने ये नहीं कहा: “अगर मदद आए…” बल्कि कहा: “जब मदद आए” यानी ये यक़ीनी वादा था कि मदद तो आयेगी ही इसीलिए हुक्म दिया कि “जब मदद आ जाये” तो आपको क्या करना है

मतलब: मोमिन की मेहनत कभी ज़ाया नहीं होती। देर हो सकती है… अंधेरा लंबा हो सकता है…लेकिन मदद-ए-इलाही का वक़्त पहले से ही तय है।

यहाँ अल्लाह तआला ने दो लफ़्ज़ इस्तेमाल किए हैं: ‘नस्र’ और ‘फतह’।

  • नस्र (Help): यह वो मदद होती है जो इंसान की ताकत से बाहर होती है। जैसे बद्र के मैदान में 313 का 1000 से जीत जाना, यह ‘नस्र’ थी।
  • फतह (Victory/Opening): इसका मतलब है “रास्तों का खुल जाना”। जैसे मक्का का दरवाज़ा खुल जाना फ़तह हो जाना, लोगों के दिलों का खुल जाना।

“फ़तह” यानी सिर्फ जंग की जीत नहीं…दिलों का खुल जाना भी फ़तह है। और मक्का सिर्फ एक शहर नहीं था…वो इस्लाम के खिलाफ़ सियासी, मज़हबी और नफ़्सियाती क़िला था। लेकिन अब वो गिर चुका था बिना किसी बदले के, बिना किसी क़त्ल-ए-आम के।

यह पहली आयत एक तसल्ली (comfort) थी। जिसमें अल्लाह अपने महबूब से कह रहा है: “ऐ नबी! देखिए, आपने सब्र किया, आपने मेहनत की, अब देखिए मेरी मदद आ गई है।”

यह हमारे लिए भी एक मैसेज है: जब हम अल्लाह के रास्ते पर चलते हैं, तो शुरू में अकेलापन होता है, मुश्किलें होती हैं। लेकिन हक़ पर चलने वालों के लिए अल्लाह का वादा है कि ‘नस्र’ आएगी ज़रूर| उसमें देर हो सकती है, लेकिन अंधेर नहीं।

Surah Nasr In Hindi Translation

एक वक्त वो था जब मक्का में नबी करीम (ﷺ) अकेले थे, और छुप-छुप कर लोगों को इस्लाम की दावत देते थे। लोग उनका मज़ाक उड़ाते थे, गालियां देते थे उस वक़्त एक साथी बनाना मुश्किल था। लेकिन अब? अब ‘अफ़वाजा’ का मंज़र है। ‘अफ़वाज’ का मतलब है फौज की तरह, ग्रुप्स की शक्ल में, भीड़ की भीड़।

अब लोग अकेले नहीं आ रहे, पूरे क़बीले (tribes) अपने सरदारों के साथ आ रहे हैं, और इस्लाम क़बूल कर रहे हैं, क्यूंकि अब लोग इस्लाम को एक कमज़ोर मज़हब नहीं, बल्कि हक़, इंसाफ़ और अमन का निज़ाम समझकर अपना रहे थे।

  • यमन से लोग आ रहे हैं।
  • ताइफ़ से लोग आ रहे हैं।
  • नज्द से लोग आ रहे हैं।

रसूलुल्लाह (ﷺ) अपनी आंखों से देख रहे हैं कि जो पौधा उन्होंने खून-पसीने से लगाया था, आज वो एक घना दरख्त (tree) बन चुका है। यह आयत हमें बताती है कि Quantity से ज़्यादा Quality और सब्र ज़रूरी है। शुरुआत हमेशा अकेली होती है, लेकिन अंजाम शानदार होता है।

अगर आप आज अपनी ज़िंदगी में किसी मुश्किल से गुज़र रहे हैं, चाहे वो जॉब हो, रिश्ते हों, या दीन पर चलना हो, और आपको लगता है कि आप अकेले हैं, तो सूरह नस्र का यह पहला हिस्सा याद करें। जिसमें अल्लाह कह रहा है: “इज़ा जा-अ…” (जब आ जाए…)

यानी नस्र का आना Confirm (पक्का) है। बस शर्त यह है कि आप मैदान छोड़कर न भागें।

जिन्होंने अकेलेपन में आंसू बहाए होते हैं, अल्लाह उन्हें भीड़ में इज़्ज़त देता है। जिन्होंने पत्थर खाए होते हैं, अल्लाह उन्हें दिलों की हुकूमत देता है। लेकिन… कहानी यहाँ खत्म नहीं होती।

ज़रा सोचिए, दुनिया का कोई भी बादशाह जब कोई बहुत बड़ी जंग जीतता है, तो वो क्या करता है?

इतिहास गवाह है – वो जश्न मनाता है, बड़े-बड़े जुलूस निकालता है, अपनी तारीफों के पुल बांधता है और कहता है, “देखो, मैंने क्या कर दिखाया!” लेकिन यह इस्लाम है, और यह अल्लाह के नबी (ﷺ) हैं। यहाँ जीत का अंदाज़ दुनिया से बिल्कुल अलग और निराला है।

हमने देखा कि अल्लाह की मदद आ गई और लोग हज़ारों की तादाद में मुसलमान हो गए। यानि मिशन पूरा हो गया, तो अब नबी करीम (ﷺ) को क्या करना चाहिए? जश्न मनाना चाहिए? या आराम करना चाहिए?

नहीं, यहाँ अल्लाह तआला ने आख़िरी आयत में अपने नबी (ﷺ) को क्या हुकुम दे रहा है? यह हुकुम हमें चौंका देता है, और रुला भी देता है। वो हुक्म क्या था?

Surah Nasr In Hindi Translation

गौर करें! अल्लाह ने यह नहीं कहा कि “ऐ नबी! अब आप जश्न मनाएं” या “आराम करें”। बल्कि हुकुम मिला “तस्बीह” (अल्लाह की पाकी) और “इस्तिग़फ़ार” (माफ़ी) का।

यहाँ एक बहुत बड़ा सवाल उठता है: हमारे नबी (ﷺ) तो ‘मासूम’ हैं (गुनाहों से पाक हैं), उन्होंने तो अपनी पूरी ज़िंदगी अल्लाह की राह में लुटा दी। पत्थर खाए, भूखे रहे, खून बहाया। अब जब सब काम पूरा हो गया, तो ‘माफ़ी’ किस बात की?

यही वो नुक्ता है जो इस दीन को सबसे अलग बनाता है, यहाँ अल्लाह हमें सिखा रहा है कि जब तुम्हें कोई बहुत बड़ी कामयाबी मिले, या जब तुम कोई बहुत बड़ा नेक काम कर लो, तो घमंड (Arrogance) मत करना। ये मत सोचना कि “मैंने किया”। बल्कि, सर झुका लेना और कहना: “या अल्लाह! तेरा शुक्र है कि तूने मुझसे ये काम लिया। और अगर मेरी कोशिश में कोई कमी रह गई हो, तो मुझे माफ़ कर देना।”

जीत के बाद ‘अहंकार’ नहीं, ‘आंसू’यही एक सच्चे मोमिन की पहचान है।

इस्तिग़फ़ार क्यों?

नबी ﷺ ने कौन सा गुनाह किया था? ये उम्मत को सिखाने के लिए था कामयाबी के बाद भी इंसान को लगे: “मैं और बेहतर कर सकता था… लेकिन शायद नहीं कर पाया तो या रब माफ़ कर।”

Surah Nasr In Hindi Translation

जब यह आयत नाज़िल हुई, तो बहुत से सहाबा (R.A) खुश हुए कि दीन मुकम्मल हो गया। लेकिन हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.) और हज़रत उमर (रज़ि.) जैसे कुछ बुज़ुर्ग सहाबा रोने लगे।

लोगों ने पूछा, “आप रो क्यों रहे हैं? यह तो खुशी का मौका है!”

उन्होंने जवाब दिया: “तुम समझे नहीं। यह सिर्फ जीत की खबर नहीं है, इसमें नबी करीम (सल्लल लाहु अलैहि वसल्लम) की वफ़ात का इशारा है।”

अल्लाह अपने नबी (ﷺ) से कह रहा है कि आपका मिशन (रिसालत का काम) अब पूरा हो चुका है। अब आप तस्बीह और इस्तिग़फ़ार के ज़रिए हमारे पास वापस आने की तैयारी करें। यह इशारा था कि प्यारे नबी (ﷺ) के दुनिया से जाने का वक्त अब बहुत करीब है।

रिवायतों में आता है कि इस सूरह के नाज़िल होने के बाद, नबी (ﷺ) अपनी नमाज़ों में, रुकू और सज्दे में कसरत से यह दुआ पढ़ने लगे थे:

"सुब्हा नकल्लाहुम्मा रब्बना व बिहम्दिका अल्लाहुम्मा-ग़फ़िरली"

(ऐ अल्लाह! तू पाक है, सब तारीफें तेरे लिए हैं, ऐ अल्लाह मुझे माफ़ कर दे।)

यह मंज़र कितना Emotional है…वो हस्ती जिसने पूरी इंसानियत को बचाया, वो अपनी ज़िंदगी के आखिरी पलों में भी अपने रब को याद कर रहे हैं, और हमें सिखा रहे हैं कि अंत भला, तो सब भला।

इस पूरी सूरह से हमें और आपको आज क्या लेकर जाना चाहिए?

  1. कामयाबी में आजिज़ी (Humility): जब आपकी जॉब लगे, जब आपके बच्चे कामयाब हों, या जब आप हज/उमराह करके आएं, तो पार्टी करने से पहले ‘सजदा’ करें। यह मत सोचें कि आप ‘महान’ हैं, बल्कि यह सोचें कि अल्लाह ‘मेहरबान’ है।
  2. तौबा का दरवाज़ा: आखिरी आयत कहती है “इन्नहू काना तव्वाबा” वो बहुत तौबा कबूल करने वाला है। तो चाहे आपने कितने भी गुनाह क्यूँ न किए हों, दरवाज़ा अभी खुला है, बस एक बार सच्चे दिल से “अस्तग़फिरुल्लाह” कह दीजिए।

अल्लाह अपने नबी के सदके हमारे गुनाहों को माफ़ फरमा दे |

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