Angles In Your Homes | 8 घर जिनमें रहमत के फ़रिश्ते नहीं आते

Angles In Your Homes : कभी आपने महसूस किया है कि घर में सब कुछ होने के बावजूद भी दिल को सुकून नहीं मिलता? खाना है, पैसा है, परिवार है, लेकिन फिर भी घर का माहौल भारी-भारी सा लगता है। छोटी-छोटी बातों पर झगड़े होते हैं, दिल बेचैन रहता है और बरकत महसूस नहीं होती। अब सवाल उठता है कि ऐसा क्यूँ हो रहा है ?

अज़ीज़ दोस्तों ! कभी कभार हमारे घर में कुछ चीजें ऐसी होती है जिनसे रहमत के फ़रिश्ते हमारे घर नहीं आते और जब रहमत के फ़रिश्ते नहीं आते तो रहमत और बरकत हमारे घर से दूर हो जाती है और सुकून भी धीरे-धीरे कम होने लगता है।

तो आइए! आज आज जानें कि वो कौन से 8 घर जिनमें रहमत के फ़रिश्ते कभी नहीं आते और देखें कहीं हमारा घर उन में से नहीं |

आजकल बहुत लोग सिर्फ़ शौक़ के लिए घर के अंदर कुत्ता पालते हैं। उन्हें लगता है कि इससे घर modern और stylish लगता है। लेकिन ये बात भी जान लें कि एक मुसलमान के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ यह है कि उसके घर में अल्लाह की रहमत आए।

सोचिए, अगर घर बहुत ख़ूबसूरत हो, सारे सुख सुविधाएँ मौजूद हों, लेकिन दिल में सुकून न हो तो क्या फायदा? और ऐसा तब होता है जब फ़रिश्ते हमारे घर में नहीं आते, क्यूँकि कुछ चीज़ें फ़रिश्तों के आने में रुकावट बनती हैं।

हदीस:

“जिस घर में कुत्ता और तस्वीर हो उसमें रहमत के फ़रिश्ते दाख़िल नहीं होते।”

सहीह बुख़ारी: 3225 | सहीह मुस्लिम: 2106

इसलिए हमें अपनी पसंद से पहले अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की बात को रखना चाहिए। अगर किसी ज़रूरत की वजह से कुत्ता रखना भी पड़े, जैसे पहरेदारी के लिए, या खेत की रखवाली के लिए तो उसे घर के बाहर रखा जाए। क्योंकि असली खूबसूरती घर की सजावट नहीं, बल्कि घर की रहमत और बरकत होती है।

धीरे धीरे घर सजाने का trend बहुत बढ़ गया है। लोग दीवारों पर बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगाते हैं, जिनमें जानदार की तस्वीरें भी होती हैं। क्यूंकि दीवारों पर इन चीज़ों का सजा होना हमें अच्छा लगता है लेकिन हदीस में इसे साफ़ मना फ़रमाया गया है।

हदीस:

“फ़रिश्ते उस घर में दाख़िल नहीं होते जिसमें तस्वीरें हों।”

सहीह बुख़ारी: 3224 | सहीह मुस्लिम: 2107

इसलिए घर में ऐसी चीज़ें न हों जिससे फ़रिश्ते अपने उलटे पांव चले जाएँ , और अगर ज़्यादा शौक़ है तो आप  कुरआन की आयतें या इस्लामिक कैलीग्राफी वगैरह लगा सकते हैं ।

क़ुरआन में अल्लाह तआला ने रिश्ता तोड़ने वालों पर सख्त वईद फ़रमाई है। नबी ﷺ का भी इरशाद है कि रिश्ता तोड़ने वाला जन्नत में दाखिल नहीं होगा।

कुरआन:

“और जो लोग उस रिश्ते को तोड़ते हैं जिसे अल्लाह ने जोड़ने का हुक्म दिया…”

सूरह मुहम्मद: 22-23
हदीस:

“रिश्ता तोड़ने वाला जन्नत में दाख़िल नहीं होगा।”

सहीह बुख़ारी: 5984

फ़रिश्ते वहां जाते हैं जहाँ लोग आपस में मुहब्बत रखते हैं और अगर किसी वजह से दूरियां हो गयीं तो उसको पाल के नहीं रखते बल्कि एक दुसरे को माफ़ करके आगे बढ़ जाते हैं लेकिन जहाँ रिश्ते जोड़ने के बजाय तोड़े जाते हों वहां से अल्लाह की रहमत रूठ जाती है

क्यूंकि रिश्ते टूटना सिर्फ़ दो लोगों के अलग होने का नाम नहीं है, बल्कि इससे पूरे घर और खानदान का माहौल बदल जाता है। जिसका असर बच्चों तक जाता है जब कि उनके दिल में नफरतों के नहीं मुहब्बतों के बीज बोने चाहियें इसलिए दिलों में दूरी मत रखिये। क्यूंकि घर में सुकून असल में मोहब्बत ही से आता है।

याद रखिए, जो इंसान रिश्ते जोड़ता है अल्लाह उसे बहुत पसंद करता है। और जिस घर में रिश्तों की मिठास हो, वहाँ रहमत भी आसानी से आती है।

Angles In Your Homes
हदीस:

“मुसलमान नापाक नहीं होता।”

सहीह मुस्लिम: 372
हदीस:

नबी ﷺ जनाबत की हालत में जल्दी ग़ुस्ल फ़रमा लेते थे।

सहीह मुस्लिम: 272

कई लोग नापाकी की हालत को हल्का समझ लेते हैं और ग़ुस्ल में देर करते रहते हैं। कभी काहिली, और कभी लापरवाही की वजह से। लेकिन इस्लाम हमें साफ़-सुथरा और पाक रहना सिखाता है। जब इंसान पाक रहता है तो उसका दिल भी हल्का और सुकून वाला महसूस करता है।

आपने महसूस किया होगा कि ग़ुस्ल के बाद इंसान fresh महसूस करता है। और ये भी हकीक़त है कि ये पाकीज़गी घर के माहौल पर भी असर डालती है।

कुरआन:

“और नरमी से बात किया करो।”

सूरह अल-अहज़ाब: 32
हदीस:

“जिस चीज़ में नरमी होती है, वह उसे खूबसूरत बना देती है।”

सहीह मुस्लिम: 2594

कुछ घर ऐसे होते हैं जहाँ हर रोज़ किसी न किसी बात पर लड़ाई होती रहती है। छोटी छोटी बातों पर एक दुसरे पर चिल्लाना, गुस्सा करना, ताने देना और बुरे अल्फ़ाज़ इस्तेमाल करना — यह सब धीरे-धीरे घर का सुकून खत्म कर देते हैं।

बच्चे भी ऐसे माहौल से डरने लगते हैं। जबकि घर वह जगह होनी चाहिए जहाँ इंसान बाहर की थकान भूल जाए, लेकिन अगर घर में ही हर वक्त tension हो तो दिल थक जाता है। फिर ये सारी दुनिया तंग नज़र आने लगती है

इसलिए घर में प्यार से बात करने का माहौल बनाइये, गुस्से की जगह नरमी से जवाब दीजिए इंशाअल्लाह  माहौल खुद बदलने लगेगा । हर बार जीतना ज़रूरी नहीं होता, अगर रिश्तों को बचाना और निभाना हमारी priority है तो कई बार हमें हारना भी पड़ता है | और जिस घर में नरमी और मोहब्बत होती है, वहाँ बरकत अपने आप आने लगती है।

हदीस:

“अल्लाह पाक है और पाक चीज़ों को ही क़बूल करता है।”

सहीह मुस्लिम: 1015
कुरआन:

“ऐ ईमान वालों! पाक चीज़ों में से खाओ जो हमने तुम्हें दी हैं।”

सूरह अल-बक़रह: 172

हराम का पैसा शुरू में बहुत अच्छा लगता है क्योंकि वह जल्दी और ज़्यादा आता है और मेहनत भी कम लगती है । लेकिन धीरे-धीरे वही पैसा आपके सुकून का दुश्मन बन जाता है। और ये हक़ीक़त है कि पैसों से आप अपने जिस्म की गिज़ा तो ख़रीद लेंगे लेकिन अपनी रूह की गिज़ा नहीं ख़रीद पाएंगे |

और हराम कमी में जिस्म तो मोटा तगड़ा होता रहता है लेकिन रूह कमज़ोर होती जाती है | आपने देखा होगा, कुछ लोगों के पास सब कुछ होता है लेकिन फिर भी उनके घर में खुशी नहीं होती। हर वक्त परेशानी, लड़ाई या बेचैनी रहती है।

क्योंकि असली बरकत सिर्फ़ हलाल कमाई में होती है। क्यूंकि ये बगैर किसी का हक़ मारे हुए अपनी मेहनत की होती है और हलाल रोज़ी कम तो हो सकती है, लेकिन उसमें दिल का सुकून होता है। इसलिए हमेशा कोशिश करनी चाहिए कि हमारी कमाई साफ़ और हलाल हो। क्योंकि जो पैसा अल्लाह को नाराज़ करके आए, वह कभी असली खुशी नहीं दे सकता।

हदीस:

“जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखता है, उसे चाहिए कि अपने मेहमान की इज़्ज़त करे।”

सहीह बुख़ारी: 6018 | सहीह मुस्लिम: 47

पहले अगरचे ग़रीबी थी, लेकिन लोग सादा दिल और मेहमान नवाज़ हुआ करते थे और ऐसा लगता था कि उनके आने से घर में रौनक आ गयी। लेकिन आज लोग चन्द लोग ऐसे हैं जिनकी ख़ूब खातिरदारी करेंगे लेकिन उनके अलावा कोई आ जाये तो बोझ और परेशानी समझने लगते हैं। और अगर कोई अचानक आ जाए तो लोग परेशान हो जाते हैं।

जबकि इस्लाम हमें सिखाता है कि मेहमान की इज़्ज़त करो। जरूरी नहीं कि आप बहुत खर्च करें। कभी मुस्कुराकर मिल लेना, पानी पूछ लेना और अच्छे तरीके से बात कर लेना भी बड़ी बात होती है। मेहमाननवाज़ी दिलों को जोड़ती है और घर में मोहब्बत बढ़ाती है। और याद रखी! जो घर दूसरों के लिए खुला रहता है, वहाँ रहमत भी ज्यादा आती है। इसलिए मेहमान को बोझ नहीं, बल्कि बरकत समझना चाहिए।

हदीस:

“साथ बैठकर खाना खाओ और बिस्मिल्लाह पढ़ो, उसमें बरकत होगी।”

अबू दाऊद: 3764 | इब्ने माजह: 3286

आज के बदलते दौर में एक चीज़ जो ज़्यादातर घरों में खो गयी वो है एक साथ मिल कर खाना, कोई कहीं busy है और कोई कहीं, हो सकता है मजबूरी हो और अपने काम से देर से आना भी इसकी वजह बनता हो लेकिन ये एक बहुत ही उम्दा बात थी जो रिश्तों में बेहतरी रखने और रहमत और बरकत को बुलाने का काम करती थी |

इसीलिए पहले पूरा परिवार साथ बैठकर खाना खाता था, बातें करता था, हँसी-मज़ाक होता था। और सही मानों तो यही चीज़ रिश्तों को मजबूत बनाती है। साथ बैठकर खाना सिर्फ़ खाने का तरीका नहीं, बल्कि मोहब्बत बढ़ाने का ज़रिया है। जब बच्चे अपने माँ-बाप के साथ बैठते हैं तो उन्हें अपनापन महसूस होता है। इसलिए कोशिश करें कि दिन में कम से कम एक वक्त पूरा परिवार साथ बैठे।

दोस्त, यह सब पढ़कर मायूस होने की ज़रूरत नहीं। यह बातें हमें शर्मिंदा करने के लिए नहीं, बल्कि रास्ता दिखाने के लिए हैं। हर घर में कुछ न कुछ कमी होती है अहम यह है कि हम उसे सुधारने का इरादा करें।

आज ही एक काम चुनिए चाहे वो किसी रिश्तेदार को फ़ोन करना हो, घर से एक तस्वीर हटाना हो, या कल का खाना साथ बैठकर खाने का फ़ैसला करना हो। अल्लाह नीयत देखता है, और जब नीयत साफ़ हो तो रहमत के दरवाज़े खुलने में देर नहीं लगती।

अल्लाह हम सब के घरों को रहमत, बरकत, और सुकून का घर बनाए। आमीन।

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