Shabe Barat 2026: शबे बरात की इबादत और फ़ज़ीलत

क्या आप अपने पिछले गुनाहों की माफी चाहते हैं? क्या आप चाहते हैं कि अल्लाह तआला आपके सारे क़ुसूर और गुनाह माफ़ कर दें? अगर हाँ, तो शब ए बरात (Shabe barat) आपके लिए एक अज़ीम मौक़ा है। ये वो मुबारक रात है जिसमें अल्लाह की रहमत ख़ासकर ज़मीन की तरफ़ नाज़िल होती है। ये वो रात है जिसमें अल्लाह अपने बंदों को पुकारता है:
“कोई है जो मुझसे माफी मांगे?”

अल्लाह तआला खुद फ़रमाता है:

“ऐ मेरे बंदों जिन्होंने अपनी जानों पर ज़ुल्म किया है, अल्लाह की रहमत से मायूस मत हो, बेशक अल्लाह सब गुनाह बख़्श देता है।”

कुरआन (सूरह ज़ुमर 39:53)

लेकिन अफ़सोस… हम में से कई लोग इस रात की हक़ीक़त को समझ नहीं पाते और शोर-शराबे, पटाखों और रस्मों में उलझ जाते हैं, जबकि हमें इस मौक़े को ग़नीमत समझना चाहिए, क्यूंकि पता नहीं कब चल चलाओ का वक़्त आ जाये|

तो चलिए, हम सब मिलकर इस रात को उसी तरीके से गुज़ारें, जैसे हमारे नबी ﷺ ने सिखाया है बिना दिखावे के, बिना बिदअत के, सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की रज़ा के लिए।

इसको समझने के लिए अल्फाज़ पर गौर करना होगा जैसे…

शब” का मतलब होता है : रात
बरात / बराअत” का मतलब होता है : बरी होना, गुनाह से छुटकारा, निजात

तो शब ए बरात का मतलब हुआ “नजात” और “छुटकारे की रात”

यानि ये वह रात है जिसमें जब बंदा अल्लाह से मग़फ़िरत मांगता है तो उसे गुनाहों से बरी कर दिया जाता है, और गुनाहों से छुटकारा दे दिया जाता है।

जैसे हम कहते हैं: लैलतुल क़द्र = क़द्र वाली रात, ठीक वैसे ही शब ए बरात बराअत वाली रात

Shabe Barat
“जब शाबान की पंद्रहवीं रात होती है तो अल्लाह तआला अपनी मख़लूक़ की तरफ़ नज़र फरमाता है 
और अपने मोमिन बंदों को बख़्श देता है…”

अल-मु‘जम अल-कबीर (तबरानी) शुअबुल ईमान (बैहक़ी)

इस रात की कुछ खास बातें:

• अल्लाह की रहमत का नुज़ूल
• मग़फ़िरत का दरवाज़ा खुला होना
• गुनाहगारों के लिए तौबा का अज़ीम मौक़ा
• बंदे को अपने आमाल-नामा पर ग़ौर करने का वक़्त

वैसे तो ये मगफिरत की रात है इसमें कोई शक नहीं है, लेकिन यहाँ ये भी समझ लेना ज़रूरी है कि कुछ लोग ऐसे हैं जिनकी इस रात में भी मगफिरत नहीं होती, चलिए देखते हैं इसके बारे में हमारे नबी ने क्या फरमाया है |

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

“अल्लाह तआला निस्फ़ शाबान की रात अपनी मख़लूक़ पर नज़र फरमाता है और सबकी मग़फ़िरत कर देता है,
सिवाए मुशरिक और उस शख़्स के जिसके दिल में कीना हो।”

सुनन इब्न माजह (हदीस 1390)
मुसनद अहमद (हदीस 6642)

ज़रा सोचिए, कितनी बड़ी बात है! अल्लाह पूरी दुनिया को माफ़ करने के लिए तैयार है, मगर सिर्फ दो चीज़ें इंसान को उसकी मग़फ़िरत और गुनाहों को ख़त्म करने से रोक देती हैं: वो हैं..

शिर्क – अल्लाह के सिवा किसी और को उसका शरीक बनाना
कीना (हसद और नफ़रत) – किसी मुसलमान भाई या बहन से दिल में दुश्मनी रखना

अगर आप चाहते हैं कि इस रात अल्लाह आपकी मग़फ़िरत फ़रमाए, तो सबसे पहले दिल साफ़ कीजिए। जिससे अनबन है, उससे सुलह कर लीजिए। जिसने आपका हक़ मारा, उसे माफ़ कर दीजिए।

Shabe Barat

बहुत से लोग पूछते हैं: “क्या शब ए बरात की कोई खास नमाज़ है? तो इसका जवाब ये है कि इस रात के लिए कोई मुकर्रर या खास नमाज़ क़ुरान और हदीस से साबित नहीं है। तो अब सवाल उठता है कि इस रात क्या करें? तो जवाब ये है कि इस रात कोशिश करें कि घर में तनहा इबादत करें|

  • दो-दो रकात करके सुकून से नफ़्ल नमाज़ पढ़ें,
  • तिलावत-ए-कुरआन समझकर करें
  • सुब्हानअल्लाह, अलहम्दुलिल्लाह का ज़िक्र व तस्बीह करें
  • इस्तिग़फ़ार यानि“अस्तग़फ़िरुल्लाह” का ज़िक्र करें
  • दुआ — अपने, वालिदैन और पूरी उम्मत के लिए

और याद रखें कि इसके लिए जलसे की ज़रूरत नहीं आप मस्जिद में जाकर भी इबादत कर सकते हैं लेकिन अपने घर में इबादत इसलिए बेहतर है क्यूंकि वहां:

• रिया (दिखावा) कम होता है
• दिल पूरी तरह अल्लाह से जुड़ता है
• शोर नहीं होता है

और वो जगह ऐसी है जहाँ सिर्फ आपको अल्लाह ही देख रहा है |

अब आती है बात शाबान के रोज़े की, तो इसके बारे में कोई सुबूत हदीस में नहीं मिलता और एक हदीस है भी, तो वो सनद के एतबार से उलमा ने इसको कमज़ोर कहा है लेकिन अब क्या रोज़ा न रखें? नहीं, आप रख सकते है

क्यूंकि हदीस में आता है कि

नबी ﷺ हर महीने के अय्याम-ए-बीज़ (13,14,15) के रोज़े रखते थे।

सुनन नसाई (हदीस 2420)

यानि हर महीने की 13,14,15 तारीख को हमारे नबी रोज़ा रखा करते थे, तो 15 शाबान भी इन दिनों में आ रहा है तो रोज़ा रख लेना चाहिए, लेकिन सिर्फ़ 15 तारीख का नहीं, बल्कि कोशिश करें13,14,15 तारीख को रोज़ा रख लें ये सुन्नत अमल है ।

कब्रों की ज़ियारत करनी चाहिए, लेकिन ये ज़ियारत सिर्फ़ शबे बरात के लिए ख़ास नहीं है, बल्कि इसके बारे में हदीस में कहा गया है

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

“क़ब्रों की ज़ियारत किया करो, क्योंकि यह आख़िरत की याद दिलाती है।”

सहीह मुस्लिम — हदीस 977

यानि कब्रिस्तान जाना दिल को नर्म करता है, दुनिया की ग़फ़लत टूटती है, और इंसान को मौत व आख़िरत याद आती है। इसलिए ये न समझें कि सिर्फ Shabe Barat में कब्रिस्तान जाने को शरीअत ने कोई ख़ास मक़ाम दिया गया है | आप किसी भी वक़्त और किसी भी दिन, जब भी चाहें क़ब्रिस्तान जाकर कब्र वालों की मगफिरत की दुआएं करें, और वहां जा कर अपनी आख़िरत की याद ताज़ा करें |

क़ब्रिस्तान जाने का सही तरीकाक़ब्रिस्तान जाने का ग़लत तरीका
अकेले या छोटे ग्रुप में जाएंमेला लगाना
मरहूमीन के लिए दुआ करेंकब्र सजाना
मौत को याद करेंचिराग़ जलाना

1. पटाखे और आतिशबाज़ी

ये इसराफ़ और गुनाह है और दूसरों को तकलीफ देना है।

कुरआन कहता है:

“बेशक इसराफ़ करने वाले शैतान के भाई हैं।”

 कुरआन (17:27)

2. हलवा या खास खाना

हल्वा तो कभी भी बना कर खाया जा सकता है, लेकिन शबे बरात के ताल्लुक़ से इसे ज़रूरी समझना ग़लत अक़ीदा है। दीन में इसका कोई सुबूत और जगह नहीं है।

3. कब्रों पर चिराग़

सुन्नत से साबित नहीं बल्कि सुन्नत के खिलाफ़ है।

Shabe Barat

क्या शब ए बरात की कोई खास नमाज़ है?

नहीं।

क्या इस रात तक़दीर लिखी जाती है?

तक़दीर का ज़िक्र ज़्यादा लैलतुल क़द्र से जुड़ा है। तक़दीर का साफ़ ज़िक्र लैलतुल क़द्र के बारे में है।

क्या पूरी रात जागना ज़रूरी है?

नहीं। थोड़ी इख़लास वाली इबादत काफी है।

ये रात शोर की नहीं, सुकून की है। ये रात दिखावे की नहीं, रो कर दुआ करने की है।

आइए, इस शब ए बरात:

• गुनाहों की माफी मांगें
• लोगों को माफ़ करें
• दिल से कीना निकालें

या अल्लाह, हमें इस मुबारक रात की हक़ीक़ी फ़ज़ीलत नसीब फ़रमा। हमारे गुनाह माफ़ कर दे। हमारी दुआएं क़ुबूल फ़रमा। पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमाह पर रहमत नाज़िल फ़रमा। आमीन या रब्बल आलमीन।

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