Salatul Tasbeeh Namaz Ka Tariqa | सलातुत तस्बीह की नमाज़

सलातुत तस्बीह (Salatul Tasbeeh Namaz Ka Tariqa) एक नमाज़ है, इसमें “सलात” का मतलब ‘नमाज़ और तस्बीह का मतलब ‘अल्लाह की पाकी बयान करना’ होता है, और इस नमाज़ को पढ़ने से इंसान के गुज़रे हुए, आने वाले, छोटे-बड़े, जान-बूझकर या ग़लती से हुए तमाम गुनाहों की माफ़ी का वादा हदीस में आया है । और हाँ, यह नमाज़ सिर्फ़ रुकू-सज्दा नहीं, बल्कि ज़ुबान, दिल और जिस्म तीनों की इबादत है ।

सलातुत तस्बीह कोई फ़र्ज़ या सुन्नत नहीं बल्कि ये एक नफ़्ल नमाज़ है, जिसे नबी करीम ﷺ ने अपने चाचा हज़रत अब्बास रज़ि. को तोहफ़े के तौर पर सिखाई। वैसे तो ये नमाज़ आम नमाज़ों की तरह पढ़ी जाती है लेकिन इस नमाज़ की ख़ासियत यह है कि इसमें एक ख़ास तस्बीह 300 बार पढ़ी जाती है, और वो है :

سُبْحَانَ اللّٰهِ وَالْحَمْدُ لِلّٰهِ وَلَا إِلٰهَ إِلَّا اللّٰهُ وَاللّٰهُ أَكْبَرُ

(सुब्हानल्लाहि वल-हम्दु लिल्लाहि वला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर)

इस नमाज़ का नाम सलातुत तस्बीह क्यूँ है?

चूंकि इस नमाज़ में ये ख़ास तस्बीह 300 बार पढ़ी जाती है, इसलिए इसका नाम “सलातुत तस्बीह” रखा गया है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने हज़रत अब्बास रज़ि. से फ़रमाया:

"ऐ चाचा! क्या मैं आपको ऐसी नमाज़ न सिखाऊँ, जिससे अल्लाह आपके अगले-पिछले, पुराने-नए, जानबूझकर या अनजाने में किए गए, छोटे-बड़े, छुपकर या खुल्लम-खुल्ला किए गए सारे गुनाह माफ़ कर दे?"

 (सुनन अबी दाऊद: 1297 | तिर्मिज़ी: 482 हसन हदीस)

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

“अगर तुम रोज़ न पढ़ सको, तो हफ़्ते में एक बार, महीने में एक बार, साल में एक बार, या ज़िंदगी में एक बार पढ़ लो।”

(सुनन अबू दाऊद: 1297)

इससे यह बात साफ़ होती है कि सलातुत तस्बीह कोई फ़र्ज़ या वाजिब नहीं, बल्कि एक बेहद फ़ज़ीलत वाली नफ़्ल नमाज़ है, जिसे रसूलुल्लाह ﷺ ने आसानी और सहूलत के साथ पढ़ने की तालीम दी है।

Salatul Tasbeeh Namaz Ka Tariqa

कब पढ़ें: यह एक नफ़्ल नमाज़ है, इसलिए इसे दिन या रात में किसी भी वक़्त पढ़ा जा सकता है ।

बेहतरीन वक़्त: जुमे के दिन, रमज़ान की रातों में, या तहज्जुद के वक़्त पढ़ना बहुत अफ़ज़ल (बेहतर) है ।

कब नहीं पढ़ सकते? सिर्फ़ उन तीन वक़्तों में न पढ़ें जब नमाज़ पढ़ना मना है (मकरूह वक़्त): वो 3 मकरूह times ये हैं,

  • सूरज निकलते वक़्त (Sunrise)।
  • सूरज डूबते वक़्त (Sunset)।
  • ज़वाल के वक़्त (जब सूरज ठीक सर के ऊपर हो)।

सलात-उल-तस्बीह में 4 रकातें होती हैं। और चारों रकातें एक ही सलाम के साथ पढ़ी जाएंगी। हर रकात में ये तस्बीह 75 बार पढ़ी जाएगी।जिससे चार रकात में कुल 300 बार तस्बीह पढ़ी जाएगी।

नियत दिल के इरादे का नाम है। इसलिए नियत ज़बान से कहना ज़रूरी नहीं लेकिन अगर कहना चाहें तो इस तरह कहें:

"नियत करता/करती हूँ मैं चार रकात नमाज़ सलातुत तस्बीह, नफ़्ल, वास्ते अल्लाह तआला के, 
रुख़ मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़।",

फिर “अल्लाहु अकबर” कहते हुए हाथ बाँध लें और नमाज़ शुरू करें। पहली रकात में

सना पढ़ेंफिर 15 बार ये तस्बीह पढ़ें
सूरह फातिहा + कोई सूरतफिर10 बार
रुकू में सुब्हान रब्बियल अज़ीम कहने के बादफिर 10 बार
रुकू से खड़े होकर समिअल्लाहु… रब्बना लकल हम्द कहने के बादफिर10 बार
सज्दे में सुब्हान रब्बियल आला कहने के बादफिर10 बार
दोनों सज्दों के बीच बैठकरफिर 10 बार
दुसरे सजदे में सुब्हान रब्बियल आला कहने के बादफिर 10 बार

फिर जब जब दूसरी, तीसरी और चौथी रकात के लिए खड़े हों, तो सूरह फातिहा से पहले 15 बार पढ़ें, उसके बाद सूरह फातिहा + कोई सूरत पढने के बाद तब 10 बार तस्बीह पढ़ेंगे |

क्यूंकि पहली रकात में सना के बाद 15 बार पढ़ा था तो दूसरी तीसरी और चौथी रकात में सना तो है नहीं, तो पहले 15 बार पढ़ लेंगे उसके बाद सूरह फ़ातिहा पढ़ेंगे |

इस तरह कुल: 15+10+10+10+10+10+10 = 75 बार हर रकात में हो जाएँगी |

Salatul Tasbeeh Namaz Ka Tariqa

आप कोई भी सूरह पढ़ सकते हैं जो आपको याद हो। लेकिन अक्सर उलमा ये सूरहें पढ़ने की सलाह देते हैं:

  • पहली रकात: सूरह अत-तकासुर
  • दूसरी रकात: सूरह अल-अस्र
  • तीसरी रकात: सूरह अल-काफ़िरून
  • चौथी रकात: सूरह अल-इख़लास

नमाज़ मुकम्मल होने के बाद अल्लाह के सामने हाथ उठाएं, अस्तग़फिरुल्लाह पढ़ें और अपने, अपने वालिदैन और पूरी उम्मत के लिए माफ़ी माँगें।

सलातुत तस्बीह सिर्फ़ एक नमाज़ नहीं, यह अल्लाह की रहमत का दरवाज़ा खटखटाने का नाम है। ज़िन्दगी छोटी है और गुनाह बहुत ज़्यादा हैं। इसलिए महीने में एक बार ही सही, इस नमाज़ को पूरी मुहब्बत और ध्यान से अदा करें। दिल हल्का होगा, गुनाह मिटेंगे और रूह पाकीज़ा हो जाएगी। अल्लाह तआला हम सबको इस नमाज़ की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए, आमीन।

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