Namaz Ke Baad Kya Padhe? नमाज़ के बाद 5 अज़कार

Namaz Ke Baad Kya Padhe? : हम और आप रोज़ाना अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त के दरबार में पाँच बार हाज़िर होकर नमाज़ तो पढ़ते हैं, लेकिन सलाम फेरते ही अपनी जगह से उठ कर चले जाते हैं और दुनिया की भागदौड़ में शामिल हो जाते हैं। चलिए ठीक है, आप कामों को अन्जाम दें, इस्लाम उसे रोकता नहीं है |

लेकिन ये भी याद रखना चाहिए कि नमाज़ के बाद के कुछ मिनट या लम्हे, जो रहमत और बरकत से भरे होते हैं, और ये लम्हे अल्लाह तआला हर नमाज़ी को अता करता है, लेकिन नमाज़ी अगर खुद ध्यान न दे और उठ कर चला जाये, तो ये रहमत और बरकत भरे लम्हे यूँ ही ज़ाया हो जाते हैं?

और यह किसी एक की कहानी नहीं है बल्कि हम में से अक्सर लोग नमाज़ के बाद की दुआएं और उनके अज़कार को छोड़ देते हैं। जबकि ये वो वक़्त है जब अल्लाह की रहमत का दरवाज़ा सबसे ज़्यादा खुला होता है।

तो चलिए! आज हम नमाज़ के बाद के 5 अज़कार को बताएँगे, साथ ही बताएँगे कि उनकी फ़ज़ीलत क्या है?, कितनी बार पढ़ना है?। ताकि हमारी ज़िंदगी में भी रहमत और बरकत के दरवाज़े खुल जाएँ।

Namaz Ke Baad Kya Padhe?

क़ुरआन में ज़िक्र की अज़मत

"ऐ ईमान वालो! अल्लाह को कसरत से याद किया करो (यानी बहुत ज़्यादा ज़िक्र किया करो), 
और सुबह व शाम उसकी पाकी बयान करो।"
(सूरह अल-अहज़ाब: 41-42)

ज़रा ग़ौर करें। अल्लाह ने इस आयत में सिर्फ़ ज़िक्र करने को नहीं कहा, बल्कि “कसरत से” यानी बहुत ज़्यादा ज़िक्र करने का हुक्म दिया है। क्यूंकि जब हम ज़िक्र करते हैं, तो

  • अल्लाह से एक ख़ास और बेहद क़रीबी रिश्ता क़ायम हो जाता है।
  • हमारे दिलों का ज़ंग (मैल) साफ़ होता है
  • और अल्लाह अपनी मुकम्मल हिफ़ाज़त में ले लेता है।

हदीस में ज़िक्र की अज़मत

"जो शख़्स हर नमाज़ के बाद 33 बार सुब्हानल्लाह, 33 बार अल्हम्दुलिल्लाह, और 33 बार अल्लाहु अकबर पढ़े (ये 99 हुए) और सौवीं बार 'ला इलाहा इल्लल्लाह, वहदहू ला शरीकलह...' पढ़े, तो उसके गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे, चाहे वो समुद्र के झाग के बराबर क्यों न हों।" 

सहीह मुस्लिम

सुब्हानल्लाह! एक छोटा-सा अमल और गुनाहों की इतनी बड़ी माफ़ी। क्या हमें इस मौक़े को हाथ से जाने देना चाहिए?

Namaz Ke Baad Kya Padhe?

तो आइए जानते हैं कि सुन्नत के मुताबिक़ हमें नमाज़ के बाद कौन से 5 ख़ास अज़कार ज़रूर करने चाहिए:

أَسْتَغْفِرُ اللّٰهَ وَأَتُوبُ إِلَيْهِ

अस्तग़ फ़िरुल्लाह वा अतूबु इलैह 

तर्जुमा : मैं अल्लाह से माफ़ी माँगता हूँ और उसी की तरफ़ लौटता हूँ

नमाज़ के फ़ौरन बाद 3 बार अस्तग़फ़ार इसीलिए पढ़ा जाता है ताकि नमाज़ में होने वाली कोताही कमी की माफ़ी मांग सकें जैसे…

या अल्लाह! मैंने तेरी इबादत तो की, लेकिन इबादत का जो हक़ था वो अदा न हो सका। मेरी इस नमाज़ में जो भी कोताही या कमी रह गई हो, उसे महज़ अपनी रहमत से माफ़ फ़रमा दे।

पूरे क़ुरान में आयतुल कुर्सी ही एक आयत है, जिसको क़ुरआन की सबसे अज़ीम आयत कहा गया है? और इसकी फ़ज़ीलत कई हदीस में आई है, एक हदीस में आता है कि

 जो शख़्स हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद आयतुल कुर्सी पढ़ता है, उसे जन्नत में जाने से मौत के सिवा कोई 
चीज़ नहीं रोक सकती।

 सोचिए ज़रा, सिर्फ़ चंद सेकंड का यह ज़िक्र और जन्नत की यक़ीनी ज़मानत! इसके अलावा बुख़ारी की हदीस में है कि :

“जब तुम सोने जाओ तो आयतुल कुर्सी पढ़ लिया करो, तो अल्लाह की तरफ़ से तुम्हारे ऊपर एक निगेहबान 
(रक्षक) मुक़र्रर हो जाएगा, और सुबह तक कोई शैतान तुम्हारे क़रीब नहीं आएगा।”

Sahih al-Bukhari : 2311

यानि हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद इसे पढ़ना बरकत और हिफ़ाज़त का बहुत बड़ा ज़रिया है।

Namaz Ke Baad Kya Padhe?

हमारे नबी ﷺ हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद इन तीनों सूरतों (सूरह इख़लास, सूरह फलक़, सूरह नास) की तिलावत फ़रमाया करते थे। ख़ास तौर पर फ़ज्र और मगरिब के बाद इन्हें तीन-तीन बार पढ़ना सुन्नत है।

आज के दौर में जहाँ हर तरफ़ हसद (जलन), नज़र-ए-बद (बुरी नज़र) और बीमारियों का ख़ौफ़ रहता है, तो ऐसे में यह सूरतें हमारे लिए एक रूहानी ढाल का काम करती हैं। और इन पर पाबन्दी करने वाला हर बुरी चीज़ से अल्लाह की पनाह में आ जाता है।

  • 33 बार: “सुब्हानल्लाह,” (अल्लाह पाक है)
  • 33 बार: “अल्हम्दुलिल्लाह” (तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं)
  • 34 बार: “अल्लाहु अकबर” (अल्लाह सबसे बड़ा है)

इसका नाम तस्बीहे फ़ातिमा इसलिए है क्यूंकि इसे नबी ﷺ ने अपनी लाडली बेटी हज़रत फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु अन्हा) को सिखाया था, जब वो अपने घर के कामों से थक कर परेशान हो जाती थीं। तो नबी ﷺ ने फ़रमाया था कि यह ज़िक्र करने से हमारे जिस्म की थकावट दूर होती है और रूह को ताक़त मिलती है।

اللّٰهُمَّ أَنْتَ السَّلَامُ وَمِنْكَ السَّلَامُ، تَبَارَكْتَ يَا ذَا الْجَلَالِ وَالْإِكْرَامِ

अल्लाहुम्मा अन्तस-सलाम, व मिन्कस-सलाम, तबारकता या ज़ल-जलालि वल-इकराम

"ऐ अल्लाह, तू ही सलाम (सलामती वाला) है, और तुझसे ही सलाम (सलामती) है, ऐ इज़्ज़त और शान वाले!"

जब हम दुनिया की अफ़रा-तफ़री में लोगों से उम्मीदें लगा कर उनसे सलामती और सुकून ढूँढते हैं, तो यह दुआ हमें याद दिलाती है कि असल सलामती कहीं और नहीं, वो तो सिर्फ़ हमारे रब के पास है।

अज़कार से जुड़े कुछ अहम सवालात (FAQs)

सवाल 1: क्या नमाज़ के बाद अज़कार पढ़ना फ़र्ज़ है?

जवाब: नहीं, नमाज़ के बाद अज़कार पढ़ना फ़र्ज़ नहीं है बल्कि यह सुन्नत-ए-रसूल ﷺ है। लेकिन अगर हम इसे छोड़ देते हैं, तो हम बहुत बड़े सवाब, बरकत और अल्लाह की ख़ास हिफ़ाज़त से महरूम रह जाते हैं।

सवाल 2: फ़ज्र के बाद अज़कार और ज़िक्र की क्या ख़ास फ़ज़ीलत है?

जवाब: फ़ज्र के बाद का वक़्त रिज़्क़ और रहमतों के बँटने का होता है। और हदीस के मुताबिक़, जो शख़्स फ़ज्र के बाद अपनी जगह ज़िक्र में मशग़ूल रहता है यहाँ तक कि सूरज निकल आए, और फिर दो रकात इशराक़ की नमाज़ पढ़े, उसे एक मुकम्मल हज और उमरे का सवाब मिलता है।

सवाल 3: क्या हम चलते-फिरते या बिना वज़ू भी अज़कार कर सकते हैं?

जवाब: जी हाँ, बिल्कुल! अगर किसी मज़बूरी की वजह से आपको नमाज़ के बाद जल्दी जाना पड़े, तो आप चलते-फिरते, गाड़ी चलाते या अपने काम करते हुए भी यह अज़कार कर सकते हैं। और किसी भी ज़िक्र के लिए वज़ू शर्त नहीं है, लेकिन बा-वज़ू होकर पढ़ना ज़्यादा अफ़ज़ल और सवाब का बाइस है।

ख़ुलासा

मेरे अज़ीज़ भाइयों और बहनों! हम दुनियावी चीज़ों और सोशल मीडिया के लिए घंटों निकाल लेते हैं, लेकिन उस रब के लिए जो हमें पालता है, हम चंद मिनट भी नमाज़ के बाद बैठना भारी समझते हैं। जबकि = यह हमारी हिफ़ाज़त का ज़रिया हैं।

तो आज ही से यह इरादा करें कि हम चाहे कितनी ही जल्दी में क्यों न हों, नमाज़ के बाद की इन सुन्नतों को कभी नहीं छोड़ेंगे। ख़ासकर फ़ज्र के बाद अज़कार की आदत डालें, यक़ीन मानें, आपकी पूरी ज़िंदगी का रुटीन बरकतों से भर जाएगा और आपके दिल को वो सुकून मिलेगा जो दुनिया की किसी भी दौलत से ख़रीदा नहीं जा सकता।

"या अल्लाह! हमें कसरत से तेरा ज़िक्र करने वाला, तेरा शुक्र अदा करने वाला और बेहतरीन तरीक़े से तेरी इबादत करने वाला बना। हमारी तमाम परेशानियों को दूर कर, हमारे दिलों को सुकून अता फ़रमा और हमें अपनी हिफ़ाज़त में रख। आमीन या रब्बुल आलमीन।"

Leave a Comment