रमज़ान के रोज़ों की क़ज़ा कैसे करें? मुकम्मल गाइड

रमज़ान का मुकद्दस महीना हर मुसलमान के लिए रहमत और मग़फ़िरत (बख्शिश) लेकर आता है। और हर मुसलमान चाहता है कि उसके रोज़े क़ज़ा न हों, लेकिन क्या करें, कभी बीमारी आ जाती है, कभी सफ़र करना पड़ जाता है, और इसके अलावा औरतों के जो ख़ास अय्याम (दिनों) हैं उनकी वजह से भी रोज़े छूट जाते हैं।

अब ऐसे में एक बड़ा सवाल उठता है, कि अब इन छूटे हुए रमज़ान के रोज़ों की क़ज़ा कैसे करें? तो, इसी सवाल के जवाब में हमने आपके लिए इस पोस्ट को तैयार किया है जिसमें तफ़सील के साथ क़ुरआन-ओ-सुन्नत की रोशनी में आप वो सब जान जायेंगे जो आपको क़ज़ा रोज़ों के बारे में जानना ज़रूरी है।

पहले तो आप ये समझ लें कि रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ हैं, और जो इबादत फ़र्ज़ होती है उसको छोड़ना गुनाह-ए-कबीरा होता है, हाँ, अगर किसी शरई उज़र (valid excuse) या किसी जायज़ वजह से रोज़ा छूट गया, (जैसे बीमारी, सफ़र वगैरा) तो इस्लाम ने “क़ज़ा” की सहूलियत दी है। वो बाद में क़ज़ा कर सकता है यानि रमज़ान के बाद वो रोज़े रख सकता है |

क़ज़ा रोज़ा क्या होता है?

अब समझिये कि क़ज़ा कहते किसे हैं,

क़ज़ा का मतलब : जो फ़र्ज़ इबादत वक़्त पर अदा न हो पाए, उसे बाद में पूरा करना। और क़ज़ा रोज़े का मतलब है: रमज़ान के जो रोज़े छूट गए हों, उन्हें बाद में रखना | इसके बारे में अल्लाह तआला फ़रमाते हैं,

अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:

"और जो तुम में से बीमार हो या सफ़र पर हो, तो दूसरे दिनों में गिनती पूरी करे।"

क़ुरआन मजीद (सूरह अल-बक़रह 2:184)

इस आयत से साफ़ ज़ाहिर है कि अगर रोज़ा छूट जाये तो वो माफ़ नहीं हो गया, बल्कि उसकी गिनती बाद में पूरी करनी होगी। यानि छूटे हुए रोज़ों की क़ज़ा बाद में करनी होगी |

ramzan ke roze ki qaza kaise kare

यहाँ पर हम उन लोगों का ज़िक्र करने जा रहे हैं, जो रोज़ा छोड़ सकते हैं, और बाद में क़ज़ा कर सकते हैं और क़ज़ा में एक रोज़ा छूटने पर सिर्फ़ एक रोज़ा रखना होता है |

सफ़र में चूंकि मशक्क़त होती है इसलिए अगर कोई लगभग 80–90 किलोमीटर या उससे ज़्यादा सफ़र पर है, तो वह मुसाफ़िर कहलाएगा। और ये मुसाफिर नमाज़ में भी क़स्र करेगा और अगर चाहे तो इसको रोज़ा छोड़ने की गुंजाइश भी है, मगर ध्यान रहे! बाद में पूरे करने होंगे। लेकिन अगर सफ़र में तकलीफ़ न हो तो सफ़र में भी रोज़ा रख सकता है।

अगर बीमारी ऐसी हो कि रोज़ा रखने से नुक़सान हो सकता हो और उसकी बीमारी को देख कर कोई झोलाछाप नहीं बल्कि एक माहिर, क़ाबिल डॉक्टर कह रहा है:       

  • अगर आप रोज़ा रखेंगे तो बीमारी बढ़ जाएगी
  • या जान जाने का अंदेशा है
  • या दवा चल रही है, रोज़ा से नुकसान होगा

तो ऐसे बीमार आदमी को रोज़ा छोड़ने की इजाज़त है। लेकिन ठीक होने के बाद पूरे छूटे हुए रोज़े रखने होंगे यानि क़ज़ा करनी होगी।

अगर कोई औरत हामिला (Pregnant) है, और उसका इलाज चल रहा है, डॉक्टर्स ने मना किया है कि इससे तकलीफ़ बढ़ने का डर है और बच्चे को नुकसान हो सकता है तो वह रोज़ा छोड़ सकती है।लेकिन अगर वह बिल्कुल फिट है, कोई दिक्कत नहीं है, तो रोज़ा रख सकती है।

अगर कोई औरत बच्चे को दूध पिला रही है और रोज़ा रखने से बच्चे को नुकसान का अंदेशा है, तो वह रोज़ा छोड़ सकती है, बाद में वह रोज़े की क़ज़ा करेगी ।

ramzan ke roze ki qaza kaise kare

औरतों के साथ कुछ मसाइल लगे रहते हैं जैसे कि

  • (periods) माहवारी
  • बच्चे की पैदाइश के बाद आने वाला खून

यह बहुत अहम मसला है क्यूंकि अभी तक ऊपर जितने भी लोगों के बारे में हमने ज़िक्र किया वो सब रोज़ा छोड़ सकते थे लेकिन अगर रखना चाहें तो रख भी सकते थे लेकिन औरत के इन नापाकी के दिनों में रोज़ा रख लिया तो क्या होगा, मसला ज़रा गौर से पढ़ें :

पीरियड और निफ़ास (बच्चे की पैदाइश के बाद के दिन) वाली औरत के नापाकी के दिन चल रहे होते हैं, इसलिए इस्लाम ने इन दोनों हालतों में,

  • रोज़ा रखने को मना किया है
  • रोज़ा रखना जायज़ ही नहीं
  • अगर रख भी लिया तो रोज़ा नहीं होगा
  • उलटे गुनाह होगा

इसलिए इन दिनों में रोज़ा न रखें, बाद में तमाम छूटे हुए रोज़ों की क़ज़ा कर लें, और याद रखें! बाद में रोज़े रखना ज़रूरी है | इसके बारे में…

हज़रत आयशा (रज़ि.) से रिवायत है कि:

हमें (हैज़ के बाद) रोज़ों की क़ज़ा का हुक्म दिया जाता था, लेकिन नमाज़ की क़ज़ा का हुक्म नहीं दिया जाता था।"

नोट: इन तमाम लोगों को छूटे हुए एक रोज़े के बदले एक रोज़ा रखना है, कोई कफ़्फ़ारा (penalty) नहीं देना।

छूटे हुए रोज़ों की क़ज़ा का सही तरीक़ा (Step-by-Step)

बहुत से लोग कन्फ्यूज़ रहते हैं कि क़ज़ा रोज़े रखने की नियत कैसे करें? और लगातार रखना पड़ेगा या अलग-अलग थोड़े थोड़े करके रख सकते हैं?

रमज़ान के अदा रोज़े और क़ज़ा रोज़े की नियत में फ़र्क होता है।

  • रमज़ान में हम आम नियत करते हैं (“मैं आज के रोज़े की नीयत करता हूँ”)।
  • जबकि क़ज़ा में पीछे छूटे हुए रोज़े होते हैं तो उसमें आपको यह नियत करनी होगी कि “मैं अपने छूटे हुए रमज़ान के फ़र्ज़ रोज़ों में सबसे पहले रोज़े की क़ज़ा की नियत करता हूँ।”

इसमें लगातार (consecutive) रोज़े रखने की शर्त नहीं है।

  • अगर आप चाहें तो लगातार रख लें।
  • अगर चाहें तो गैप देकर (हफ़्ते में 2 या 3 दिन) रख लें।

दोनों तरीक़े जायज़ हैं।

बेहतर यही है कि अगला रमज़ान आने से पहले पिछले रोज़ों की क़ज़ा पूरी कर ली जाए। और हदीस से भी मालूम होता है कि सहाबा-ए-कराम अगले रमज़ान से पहले क़ज़ा पूरी करने की कोशिश करते थे।

लेकिन अगर किसी ने सुस्ती में अगला रमज़ान आने तक क़ज़ा नहीं की, तो उस पर ताख़ीर (देरी) का गुनाह होगा, लेकिन क़ज़ा फिर भी माफ़ नहीं होगी, उसे रखना ही पड़ेगा।

मसअला हुक्म
बीमारी में रोज़ा छूट गयाठीक होने पर क़ज़ा
सफ़र में छोड़ाबाद में क़ज़ा
हैज़/निफ़ासबाद में क़ज़ा
जानबूझकर तोड़ातौबा + क़ज़ा
गर्भवती (प्रेगनेंट)बाद में क़ज़ा

सवाल 1: अगर क़ज़ा रोज़ा रखा और बीच में तोड़ दिया तो क्या होगा?

जवाब: अगर किसी सख्त तकलीफ़ की वजह से तोड़ा, तो गुनाह नहीं, लेकिन उसकी क़ज़ा फिर से रखनी होगी। अगर बिला-वजह तोड़ा तो गुनाह है और उसकी क़ज़ा लाज़िम है (कफ़्फ़ारा नहीं, क्योंकि ये रमज़ान का अदा रोज़ा नहीं था)।

सवाल 2: क्या क़ज़ा रोज़े सर्दियों (Winter) में रख सकते हैं?

जवाब: जी हाँ! उसमें दिन छोटे होते हैं, प्यास नहीं लगती, इसलिए क़ज़ा पूरी करने का बेहतरीन वक़्त सर्दी है।

सवाल 3: अगर कोई क़ज़ा किए बिना मर जाए तो?

जवाब: अगर कोई शख्स बीमार था और ठीक होने से पहले ही इंतिक़ाल कर गया, तो उस पर कोई पकड़ नहीं। लेकिन अगर वो ठीक हो गया था और फिर भी क़ज़ा नहीं की, तो उसके वारिसीन (Heirs) को चाहिए कि उसकी तरफ से ‘फिदया’ (गरीबों को खाना) अदा करें।

आख़िरी नसीहत

कई लोग सोचते हैं “इतने रोज़े छूट गए, अब क्या फ़ायदा?” लेकिन याद रखिए: अल्लाह इंतज़ार कर रहा है कि उसका बंदा लौट आए। तौबा और क़ज़ा से ज़िंदगी बदल सकती है। इसलिए आज ही गिनती करें कितने रोज़े छूटे हैं। चाहे हफ़्ते में 2 रोज़े रखें या महीने में 3, आहिस्ता-आहिस्ता ये कर्ज़ उतर जाएगा और आपका दिल सुकून पाएगा।

अल्लाह हम सबको रमज़ान की क़द्र करने और छूटे हुए रोज़ों को पूरा करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।

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