Kin Chizon Se Roza Makrooh Hota Hai? जब आप रोज़ा रखते हैं तो उन सारी चीज़ों से बचते हैं जिन से रोज़ा टूट जाता है, क्यूंकि इससे रोज़ा टूट जाता है लेकिन क्या आप उन चीज़ों से बचते हैं जो रोज़ा को तोड़ती तो नहीं हैं, लेकिन रोज़े को मकरूह कर देती हैं और रोज़े की रूह को कमज़ोर कर देती है, यानि रोज़ेदार दिन भर भूका प्यासा रहा लेकिन सवाब भी कम हो गया और जो फ़ायदा मिलने वाला था वो भी न मिल सका |
जी हाँ! कभी-कभी हम कुछ ऐसी छोटी गलतियाँ और ऐसे काम कर बैठते हैं जिनसे हमारा रोज़ा टूटता तो नहीं, लेकिन मकरूह हो जाता है और उसकी रूह, नूरानियत और बरकत कम हो जाती है। इसलिए टूटने वाली चीज़ों के साथ साथ मकरूह कर देने वाली चीज़ों से बचना बहुत ज़रूरी है |
तो, इंशाअल्लाह, आज हम समझेंगे कि Kin Chizon Se Roza Makrooh Ho Jata Hai? और कौन सी आदतें हैं जो रोज़े की रूह को कमज़ोर कर देती हैं, ताकि हमारा रोज़ा सिर्फ़ भूख-प्यास न हो, बल्कि जन्नत की तैयारी बन जाए।
अल्लाह का हुक्म
रोज़ा सिर्फ मुँह बंद करने का नाम नहीं है, बल्कि यह बुराइयों से ‘परहेज़’ करने का नाम है। अल्लाह तआला ने हमें भूखा रखकर यह सिखाया है कि जब हम हलाल रिज़्क छोड़ सकते हैं, तो हराम कामों को छोड़ना कितना ज़रूरी है।
अल्लाह तआला सूरह अल-बक़रह में फरमाता है:
"ऐ ईमान वालों! तुम पर रोज़े फर्ज़ किए गए, जैसे तुम से पहले लोगों पर फर्ज़ किए गए थे, ताकि तुम
'तक़वा' (परहेज़गारी) इख्तियार करो।"
प्यारे नबी (ﷺ) की तालीम:
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया:
"जो शख्स (रोज़े की हालत में) झूठ बोलना और उस पर अमल करना न छोड़े, तो अल्लाह को उसकी कोई
ज़रूरत नहीं कि वह अपना खाना और पीना छोड़े।"
(सहीह बुखारी: 1903)
ज़रा इस हदीस के लफ़्ज़ों पर गौर करें। कितनी बड़ी बात है! अगर हमारे अख्लाक और हमारी ज़बान पर लगाम नहीं है, तो हमारा भूखा रहना अल्लाह के नज़दीक सिर्फ एक जिस्मानी वर्ज़िश (Exercise) है। जबकि रोज़े का असल मकसद ‘तक़वा’ पैदा करना है, और मकरूह काम इसी तक़वे को नुकसान पहुँचाते हैं।

वो बातें जिनसे रोज़ा मकरूह हो जाता है
‘मकरूह’ का मतलब है वह काम जो नापसंद किया गया हो। तो इनसे रोज़ा टूटता तो नहीं है, लेकिन उसका ‘सवाब’ (Reward) बहुत कम हो जाता है। तो आइए, समझते हैं:
1. ज़बान की कड़वाहट: झूठ, गीबत और गुस्सा
अक्सर रोज़े की हालत में जब भूख और प्यास लगती है, तो इंसान का मिज़ाज चिड़चिड़ा हो जाता है। हम छोटी-छोटी बात पर गुस्सा करने लगते हैं या किसी की पीठ पीछे बुराई (गीबत) करने लगते हैं।
- इससे क्यों बचना है? क्योंकि रोज़ा एक ढाल है। जब आप ज़बान से किसी का दिल दुखाते हैं, तो उस ढाल में सुराख हो जाता है।
- कैसे बचें? जब भी गुस्सा आए, तो ज़हन में लायें “इन्नी साइमुन” (मेरा रोज़ा है)।
ग़ुस्सा रोज़ा क्यों मक़रूह करता है?क्योंकि रोज़ा सब्र की ट्रेनिंग है। ग़ुस्सा सब्र का दुश्मन है।
2. बिला-ज़रूरत चीज़ों को चखना या चबाना
कुछ लोग आदत के तौर पर या शक दूर करने के लिए खाने को बार-बार ज़बान पर रखकर चखते हैं। तो अगर बहुत मजबूरी हो जैसे किसी ऐसी खातून के लिए जिसका शौहर बहुत मिज़ाज वाला हो और नमक कम-ज़्यादा होने पर हंगामा करे तो ज़बान की नोक पर रख कर चखा जा जा सकता है लेकिन अगर मजबूरी न हो तो मकरूह है | इसी तरह, किसी चीज़ को चबाकर थूक देना (बिना हलक के नीचे उतारे) भी रोज़े की रूह के खिलाफ है।
3. वज़ू और ग़ुस्ल में ज़रूरत से ज़्यादा सख्ती
वज़ू करते वक्त नाक में बहुत ऊपर तक पानी चढ़ाना या कुल्ली करते वक्त पानी को हलक के बहुत करीब ले जाना मकरूह है। क्यूंकि इससे पानी पेट में जाने का खतरा बढ़ जाता है।और दीन हमें एहतियात (Precaution) सिखाता है।
4. जिस्मानी लज्जत और बेजा गुफ्तगू
मियाँ-बीवी का रोज़े की हालत में ऐसी बातें करना या हरकतें करना जिससे जज़्बात बेकाबू होने का अंदेशा हो, रोज़े को मकरूह कर देता है। रोज़ा तो नफ्स (इच्छाओं) को मारना सिखाता है, उन्हें भड़काना नहीं।
5. फु़ज़ूल कामों में वक्त ज़ाया करना
सारा दिन सोकर गुज़ार देना या फिल्म-गाने देखकर वक्त काटना रोज़े की तौहीन है। क्यूंकि आप रोज़ा भी है…और आँखें हराम चीज़ों पर। याद रखिये! रोज़ा आँखों का भी है, और हराम नज़र दिल को गंदा करती है, रोज़े की नूर छीन लेती है।
बचने के स्टेप्स:
- मोबाइल में फ़िल्टर या कंट्रोल लगाएँ
- सोशल मीडिया use कम करें
- टाइम पास के बजाय तिलावत करें
और ज़्यादा सोना इसलिए नापसन्द किया गया है क्यूंकि रोज़ा इबादत के लिए है, सिर्फ टाइम पास के लिए नहीं। इसलिए थोड़ी नींद लें, मगर दिन का कुछ हिस्सा इबादत, तस्बीह, दुआ, इस्तिग़फ़ार में गुजारें |

“ग़लतियाँ और ग़लतफ़हमियाँ” (Mistakes & Myths)
हमारे मुआशरे (Society) में मकरूह चीज़ों को लेकर कुछ गलत बातें मशहूर हैं, जिन्हें दुरुस्त करना ज़रूरी है:
गलतफहमी: थूक इकट्ठा करके निगलना रोज़ा तोड़ देता है।
ऐसा नहीं है इससे रोज़ा टूटता नहीं, लेकिन जानबूझकर मुँह में थूक जमा करके निगलना ‘मकरूह’ है। यह एक गंदी आदत है जिससे बचना चाहिए।
गलतफहमी: कमज़ोरी की वजह से रोज़ा तोड़ देना जायज़ है।
बिलकुल नहीं, मामूली सरदर्द या प्यास की वजह से रोज़ा तोड़ना जायज़ नहीं है। जब तक जान जाने का खतरा या कोई सख्त बीमारी न हो, रोज़ा मुकम्मल करना फर्ज़ है।
FAQs: आपके ज़रूरी सवाल
Q1. क्या रोज़े में फिल्म देखना या मोबाइल गेम खेलना मकरूह है?
जी हाँ, फिल्म देखना जिसमें नामहरम को देखा जाए या गाने सुने जाएं, रोज़े की रूह को ज़ख्मी कर देता है। रोज़ा तो हमारी आँखों और कानों की हिफाज़त के लिए है। वक्त बिताने के लिए मोबाइल गेम्स में उलझना भी रोज़े की बरकत को कम करता है।
Q2. क्या रोज़े की हालत में इत्र या खुशबू लगाना मकरूह है?
नहीं, इत्र या खुशबू लगाना मकरूह नहीं है। यह हमारे नबी (ﷺ) की सुन्नत है। हालांकि, अगर कोई जानबूझकर अगरबत्ती या धुएं को नाक से खींचता है, और जिससे धुआं हलक में चला जाये तो रोज़ा टूट जायेगा ।
Q3. अगर रोज़े में ग़ुस्ल (नहाना) वाजिब हो जाए, तो क्या रोज़ा मकरूह होगा?
अगर सोते वक्त एहतलाम (Nightfall) हो जाए, तो इससे रोज़ा मकरूह नहीं होता और न ही टूटता है। बस जितनी जल्दी हो सके पाकी हासिल कर लेनी चाहिए ताकि नमाज़ें कज़ा न हों।
Q1: क्या ग़ुस्सा करने से रोज़ा टूट जाता है?
नहीं टूटता, मगर मक़रूह हो जाता है और सवाब कम हो जाता है।
Q2: क्या ग़ीबत से रोज़ा खराब हो जाता है?
रोज़ा रहता है, मगर उसकी रूह और बरकत चली जाती है।
नतीजा और एक रूहानी दुआ
रोज़ा सिर्फ पेट का नहीं, दिल, आँख, ज़बान और अख़लाक़ का भी है। मक़रूह चीज़ों से बचेंगे, तो रोज़ा जन्नत का ज़रिया बनेगा।
दुआ:
या अल्लाह! हमारे रोज़ों को सिर्फ भूख-प्यास न बना, बल्कि तक़्वा, सब्र और नूर का ज़रिया बना दे। हमें गुनाहों से बचा, हमारी ज़बान, आँख और दिल का भी रोज़ा क़ुबूल फ़रमा। आमीन।