Roze Ka Kaffara Kaise Ada Kare? रोज़े का कफ़्फ़ारा कैसे अदा करे?

Roze Ka Kaffara Kaise Ada Kare? : रमज़ान और उसमें रखे जाने वाले रोज़े अल्लाह की तरफ़ से मोमिनों के लिए बहुत बड़ी नेमत हैं। इस मुक़द्दस महीने में हर बालिग़ और अक़्लमंद मुसलमान पर रोज़े फ़र्ज़ किए गए हैं। लेकिन कभी कभी अपनी ख़्वाहिशात के ग़लबे में आकर इंसान से ग़लती हो जाती है और रोज़ा टूट जाता है।

जब रोज़ा टूट जाता है तो ये सवाल उठता है कि अब मुझे “क़ज़ा” देनी होगी या “कफ़्फ़ारा” अदा करना होगा। और अगर कफ्फारा अदा करना होगा तो बहुत से लोग कन्फ्यूज़ रहते हैं कि Roze Ka Kaffara Kaise Ada Kare? |

इससे पहले आपने पढ़ा कि कुछ लोगों को रोज़ा छूटने पर या टूटने पर क़ज़ा वाजिब होती है यानि सिर्फ एक रोज़ा रखना होता है लेकिन अगर कोई शख्स जानबूझकर रोज़ा तोड़ देता है, तो इस्लाम ने उसके लिए कफ़्फ़ारा (penalty) मुक़र्रर किया है, यानि उसको कफ्फारा देना होगा |

तो आइये कुरआन और हदीस की रौशनी इस अहम मसले को आसान ज़बान में समझें ।

रोज़ा फ़र्अज़ हो गया है इसको बताने के लिए अल्लाह तआला ने कुरआन में ये आयत उतारी जिसमें …

अल्लाह तआला फ़रमाता है

"ऐ ईमान वालो! तुम पर रोज़े फ़र्ज़ किए गए जैसे तुमसे पहले लोगों पर फ़र्ज़ किए गए थे, ताकि तुम परहेज़गार बनो।"

सूरह अल-बक़रह 2:183

यह आयत बताती है कि रोज़ा एक बहुत अहम इबादत है। इसलिए जानबूझकर इसे तोड़ना मामूली बात नहीं, बल्कि बड़ी लापरवाही है, जिस पर कफ़्फ़ारा वाजिब हो सकता है।

Roze Ka Kaffara Kaise Ada Kare?

कफ़्फ़ारा उस गुनाह या गलती का जुर्माना (penalty) है, जो जानबूझकर रोज़ा तोड़ने की वजह से वाजिब होता है।

जैसे अगर कोई शख़्स रमज़ान का फ़र्ज़ रोज़ा जान-बूझकर, बग़ैर किसी उज़्र (valid reason) के तोड़ दे, तो उस पर दो चीज़ें वाजिब हो जाती हैं: या तो क़ज़ा या कफ्फारा

क़ज़ाकफ़्फ़ारा
उस छूटे हुए रोज़े के बदले एक रोज़ा रखना।वो भारी जुर्माना जो रोज़े की हुरमत पामाल करने पर शरीअत ने मुक़र्रर किया है। मतलब एक छूटे हुए रोज़े के बदले 60 रोज़े रखना

याद रहे! इसका मकसद सज़ा देना नहीं, बल्कि बंदे को अपनी गलती का एहसास दिलाना और उसे तौबा की तरफ लाना है।

याद रहे ! हर रोज़ा टूटने पर कफ़्फ़ारा वाजिब नहीं होता बल्कि इसके लिए कुछ शर्तें हैं।

पहली शर्त : रमज़ान का फर्ज़ रोज़ा तोड़ा हो  (नफ़्ली या क़ज़ा रोज़ों पर कफ़्फ़ारा नहीं)।
दूसरी शर्त : रोज़ा जान-बूझकर तोड़ा गया हो , जैसे खाना, पीना या बीवी से जिन्सी तअल्लुक़ (intercourse) कर लेना।
तीसरी शर्त : इंसान को याद हो कि वो रोज़े से है, इसके बावजूद उसने ये काम किया हो।

लेकिन अगर कोई शख़्स भूलकर कुछ खा-पी ले, तो उससे रोज़ा नहीं टूटता और न ही कोई कफ़्फ़ारा लाज़िम आता है।

नीचे दिए गए काम अगर जानबूझकर किए जाएँ तो कफ़्फ़ारा वाजिब होगा:

1. हमबिस्तरी (शारीरिक संबंध बनाना)

रोज़े की हालत में जानबूझकर शौहर-बीवी का संबंध बनाने से कफ़्फ़ारा वाजिब हो जाता है। यह सबसे बड़ी वजह है।

2. जानबूझकर खाना या पीना

अगर किसी ने जानबूझकर खाना खाया या पानी पिया बिना किसी शरई वजह के (Valid Reason) तो कफ़्फ़ारा वाजिब होगा।

3. जानबूझकर दवा खाना

कोई गोली, सिरप या इंजेक्शन जो गिज़ाई ताक़त दे, जानबूझकर लिया तो कफ़्फ़ारा लगेगा।

एक सहाबी (रज़ि.) नबी ﷺ के पास आए और कहा: "मैं हलाक हो गया!"
आप ﷺ ने पूछा: "क्या हुआ?"
तो उन्होंने कहा: "मैंने रोज़े की हालत में अपनी बीवी से संबंध (intercourse) बना लिया।"
तो रसूलुल्लाह ﷺ ने उन्हें कफ़्फ़ारे के तीन मराहिल (stages) बताए:

1. एक गुलाम आज़ाद करो

2. अगर नहीं, तो 60 रोज़े लगातार रखो

3. अगर इसकी भी ताक़त न हो, तो 60 मिस्कीनों को खाना खिलाओ

सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम

यही हदीस रोज़े के कफ़्फ़ारे की असल बुनियाद है।

Roze Ka Kaffara Kaise Ada Kare?

जैसा कि ऊपर हदीस में आप ने पढ़ा कि इस्लाम ने कफ़्फ़ारा अदा करने के तीन तरीके बताए हैं। लेकिन याद रहे कि तीनों तरीक़े हर किसी के लिए नहीं है | इसलिए आप अपनी मर्जी से तीनों में से किसी भी ऑप्शन का इंतख़ाब नहीं कर सकते। नीचे तफ़सील दी गयी है गौर से पढ़ें |

पहला तरीका: गुलाम आज़ाद करना

चूँकि आज के दौर में ग़ुलामी का निज़ाम ख़त्म हो चुका है, इसलिए ये तरीका नहीं चलेगा बल्कि दूसरा तरीका अपनाया जाएगा।

दूसरा तरीका: लगातार 60 रोज़े रखना

यही तरीक़ा है जिससे आपका Kaffara अदा होगा | लेकिन रोज़े रखने से पहले ये याद रहे कि…

  • ये रोज़े मुसल्सल (Continue) होने चाहिए, यानी दरमियान में कोई नाग़ा (gap) न हो।
  • अगर 59 रोज़े रखने के बाद भी एक रोज़ा छूट गया, तो शरीअत का हुक्म है कि दोबारा गिनती शुरू से की जाए यानि दोबारा रोज़े रखे जाएँ |
  • औरतों के लिए उनके ख़ास दिन (periods) के नागे माफ़ हैं, वो पाक होने के बाद अपनी गिनती जारी रख सकती हैं।

तीसरा तरीका: 60 मिस्कीनों को खाना खिलाना

अगर कोई शख़्स इतना बूढ़ा या शदीद बीमार हो कि वो 60 रोज़े रखने की ताक़त बिल्कुल न रखता हो और मुस्तक़बिल में सेहतयाबी की उम्मीद भी न हो, तब वो ये रास्ता अपना सकता है: (यानि ये तरीक़ा सिर्फ बूढ़े या सख्त बीमार के लिए है जिसमें 60 रोज़े रखने की ताक़त बिल्कुल न हो और आगे भी सेहत ठीक होने की उम्मीद न हो)

तो ऐसा शख्स 60 मोहताज लोगों को दो वक़्त को पेट भर कर खाना खिलाए। या फिर हर मिस्कीन को सदक़ा-ए-फ़ित्र के बराबर रक़म या अनाज (गेहूं/आटा) दे दे।

बहुत लोग बेवजह घबरा जाते हैं, जबकि कई मामलों में सिर्फ क़ज़ा होती है, कफ़्फ़ारा नहीं।

नबी ﷺ ने फरमाया: 

"जो रोज़ेदार भूलकर खा ले या पी ले, वह अपना रोज़ा पूरा करे, क्योंकि उसे अल्लाह ने खिलाया-पिलाया।"

📚 जामे तिर्मिज़ी
  • भूलकर खा लिया या पी लिया
  • जबरदस्ती रोज़ा तुड़वाया गया
  • बीमारी की वजह से रोज़ा छोड़ा
  • सफ़र में रोज़ा नहीं रखा
  • उल्टी खुद-ब-खुद आ गई
  • खून निकल गया (जैसे दाँत से)

इन सूरतों में बाद में सिर्फ़ एक रोज़ा रखना होगा।

क्या एक से ज़्यादा रोज़ों का एक ही कफ़्फ़ारा होगा?

अगर किसी ने एक ही रमज़ान में कई रोज़े जान-बूझकर तोड़ दिए और अभी तक पहले का कफ़्फ़ारा अदा नहीं किया, तो इमाम अबू हनीफ़ा (रह.) के नज़दीक एक ही कफ़्फ़ारा (60 रोज़े) तमाम रोज़ों के लिए काफ़ी होगा। लेकिन अगर अलग-अलग सालों में रोज़े तोड़े हैं, तो हर साल के लिए अलग कफ़्फ़ारा होगा।

क्या कफ़्फ़ारे की रक़म मस्जिद में दे सकते हैं?

जी नहीं। कफ़्फ़ारे की रक़म सिर्फ़ उन मुस्तहिक़ लोगों (deserving people) को दी जा सकती है जो ज़कात लेने के हक़दार हों। मस्जिद की तामीर, मदरसे के उस्ताद की तनख़्वाह या दीगर कामों में ये रक़म इस्तेमाल नहीं की जा सकती।

महज़ कफ़्फ़ारा अदा कर देने से ज़िम्मेदारी पूरी नहीं होती। रोज़ा जान-बूझकर तोड़ना अल्लाह की नाफ़रमानी और बहुत बड़ा गुनाह है। इसके लिए बारगाह-ए-इलाही में गिड़गिड़ा कर सच्ची तौबा करना लाज़िम है। अल्लाह तआला तौबा करने वालों को पसंद फ़रमाता है।

रोज़ा एक रूहानी इबादत है जो हमें सब्र और तक़वा सिखाती है।इसलिए इसकी हुरमत का पास ओ लिहाज़ रखना हर मोमिन का फ़र्ज़ है। लेकिन अगर कभी किसी से ग़लती से रोज़ा टूट जाए, तो जल्द से जल्द उसकी तलाफ़ी करें और ऊपर बताए गए शरई तरीक़े के मुताबिक़ अपना कफ़्फ़ारा अदा करें।

मौत का कोई वक़्त मुक़र्रर नहीं, लिहाज़ा अपनी आख़िरत संवारने के लिए अदायगी में ताख़ीर (देरी) न करें। अल्लाह हम सबको रमज़ान का अदब करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

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