Sadqa Aur Zakat Me Kya Farq Hai? | सदक़ा और ज़कात में फ़र्क

Sadqa Aur Zakat Me Kya Farq Hai? : कभी कभी ऐसा लगता है कि हम इतनी मेहनत करते हैं, पैसा कमाते हैं, लेकिन फिर भी घर में वो ‘बरकत’ नज़र नहीं आती जिसकी हमें तलाश है? दूसरी तरफ़ बीमारियां, परेशानियां और अचानक आने वाले खर्चे हमारा पीछा ही नहीं छोड़ते। तो मेरे अज़ीज़ दोस्तों! चेक करिए, अगर आपका माल नापाक है तो आपके माल में बरकत नहीं होगी |

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने अगर हमें माल अता किया है, तो साथ में हमें यह भी सिखाया है कि उस माल को ‘पाक’ कैसे करना है और उससे ‘सवाब’ कैसे कमाना है। यहीं पर ये दो लफ़्ज़ हमारे सामने आते हैं पहला ज़कात (Zakat) और दूसरा सदक़ा (Sadaqa)।

अक्सर लोग इन दोनों में कंफ्यूज रहते हैं, कि ये ज़कात क्या है ये कब और कितनी देनी होती है?, और ये सदक़ा क्या है ये कब और कितना देना होता है? बहुत से लोग सदक़ा और ज़कात को एक ही समझ लेते हैं।

तो आज इंशाअल्लाह वो कन्फ्यूज़न क्लियर हो जाएगी, क्यूंकि आज हम जानेंगे कि सदक़ा और ज़कात में फ़र्क क्या है, (Sadqa Aur Zakat Me Kya Farq Hai? ) ताकि हमारा अमल सही हो, और ज़िंदगी में बरकत हो,।

Sadqa Aur Zakat Me Kya Farq Hai

अल्लाह तआला अपने बंदों से कितना प्यार करता है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाइए कि वो हमारे छोटे से अमल का बदला कई गुना बढ़ाकर देता है।

"जो लोग अपना माल अल्लाह की राह में खर्च करते हैं, उनकी मिसाल ऐसी है जैसे एक दाना, जिससे सात बालें उगें और हर बाल में सौ दाने हों। और अल्लाह जिसके लिए चाहता है (सवाब में) इज़ाफ़ा कर देता है। और अल्लाह बड़ी वुसअत वाला (और) सब कुछ जानने वाला है।"

(सूरह अल-बक़रह: 261)

यहाँ अल्लाह ने यह नहीं कहा कि माल कम हो जाएगा। बल्कि फ़रमाया कि यह बढ़ेगा, बिलकुल वैसे ही जैसे एक बीज ज़मीन में जाकर ख़त्म नहीं होता, बल्कि एक लहलहाती फसल बन जाता है।

ज़कात दिल को माल की मोहब्बत से पाक करती है, गरीबों का हक़ अदा करती है, और समाज में बराबरी लाती है। यह सिर्फ दान नहीं, यह रब की तरफ़ से लगाया गया हक़ है।

हमारे प्यारे नबी, हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (ﷺ) ने हमें माल खर्च करने के बारे में फ़रमाया…

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया:

"सदक़ा गुनाहों को इस तरह बुझा देता है, जिस तरह पानी आग को बुझा देता है।"

(जामे तिर्मिज़ी)

एक और जगह ज़कात की अहमियत बताते हुए फ़रमाया कि जिसने अपने माल की ज़कात अदा नहीं की, उसका माल क़यामत के दिन एक ज़हरीले सांप की शक्ल अख़्तियार कर लेगा। (सहीह बुख़ारी)।

ये हदीसें हमें बताती हैं कि ज़कात या सदका देना सिर्फ़ सिर्फ दुसरे की ‘मदद’ नहीं है, बल्कि यह खुद को बचाने का ज़रिया भी है।

Sadqa Aur Zakat Me Kya Farq Hai

नीचे टेबल में दिए गए एक एक पॉइंट को गौर से पढेंगे तो आपको दोनों का असली फ़र्क समझ आ जायेगा कि “सदक़ा और ज़कात दोनों के हुक्म क्या है?, कब देना है?, कितना देना है?, किसको देना है?

फ़र्क का आधार (Basis)ज़कात (Zakat)सदक़ा (Sadqa)
हुक्म (Ruling)यह इस्लाम का तीसरा और अहम सुतून (Pillar) है, और हर उस मुसलमान पर फ़र्ज़ है। (जिसके पास इस्लाम की बताई गयी निसाब की लिमिट के बराबर माल हो) यह नफ़्ल (Voluntary) है, आप अपनी मर्ज़ी से देते हैं। यह फ़र्ज़ तो नहीं है, लेकिन इसकी फ़ज़ीलत बहुत ज़्यादा है। न देने पर कोई गुनाह नहीं, लेकिन देने पर सवाब बहुत ज़्यादा है।
किसे दे सकते हैं?सिर्फ़ 8 ख़ास क़िस्म के लोगों को दे सकते हैं, जो क़ुरान (सूरह तौबा: 60) में बताए गए हैं। (जैसे फ़क़ीर, मिस्कीन, क़र्ज़दार, मुसाफ़िर वगैरह)। आप अपने सगे माँ-बाप, दादा-दादी, या अपनी औलाद को ज़कात नहीं दे सकते।यह किसी भी ज़रूरतमंद को दिया जा सकता है, चाहे वह मुस्लिम हो या ग़ैर-मुस्लिम।
निसाब (Amount)इसके लिए माल का एक ख़ास मिक़दार (Nisab) तक पहुँचना ज़रूरी है। जैसे आपके पास (साढ़े सात तोला सोना या साढ़े बावन तोला चांदी या उसके बराबर नक़द पैसे या माल-ए-तिजारत) हो, और उस पर एक साल भी गुज़र चुका हो, तो उसपर 2.5% (ढाई प्रतिशत) ज़कात देना ही होगा। इसके लिए कोई क़ैद नहीं, एक खजूर भी दी जा सकती है। आप ₹10 दें, या ₹1000 दें या अपनी पूरी जायदाद अल्लाह की राह में दे दें। और इसमें ज़कात के “निसाब” या लिमिट की तरह कोई शर्त भी नहीं है।
वक़्त (Time)साल में एक बार फ़र्ज़ होती है जब आपके माल पर एक (Islamic) साल पूरा हो जाए।यह साल के किसी भी दिन, किसी भी वक़्त दिया जा सकता है।

क्या सदक़ा सिर्फ पैसे देने का नाम है?

अक्सर हम सोचते हैं कि जेब से पैसा देना ही सदक़ा है। लेकिन सुब्हानल लाह! हमारे दीन की ख़ूबसूरती देखिए कि नबी करीम (ﷺ) ने फ़रमाया:

  • अपने भाई को देख कर मुस्कुराना सदक़ा है।
  • रास्ते से पत्थर या कांटा हटाना सदक़ा है।
  • किसी भटके हुए को रास्ता दिखाना सदक़ा है।
  • इल्म (Knowledge) फैलाना सदक़ा है।

दोस्तों, यहाँ कुछ आसान तरीक़े हैं जिनसे आप ज़कात और सदक़े को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना सकते हैं:

  1. ज़कात का अलग अकाउंट/डायरी बनाएं: अपनी आमदनी और बचत का हिसाब रखें। जैसे ही इस्लामी साल पूरा हो, एक पाई का भी हिसाब करके 2.5% अलग कर दें। इसे “बोझ” न समझें, इसे अपने माल का “बीमा” (Insurance) समझें।
  2. डेली सदक़ा बॉक्स: अपने घर में एक छोटा सा बॉक्स रखें। रोज़ाना सुबह उसमें कुछ न कुछ (चाहे 10 या 5 रुपये ही क्यों न हो) डालें। इससे घर में बलाएं और मुसीबतें नहीं आतीं।
  3. ऑटो-पे (Auto-Pay) सिस्टम: आज कल डिजिटल ज़माना है। किसी भरोसेमंद मदरसे या चैरिटी को हर महीने एक छोटी रकम ऑटो-डेबिट पर सेट कर दें। आपको पता भी नहीं चलेगा और आपके नाम का सदक़ा अल्लाह के दरबार में पहुँच जाएगा।
  4. हुनर का सदक़ा: अगर आपके पास पैसा नहीं है, तो अपना वक़्त या हुनर (Skill) किसी ग़रीब को सिखा दें। यह सदक़ा-ए-जारिया बन जाएगा और आपको इसका सवाब हमेशा मिलता रहेगा |
Sadqa Aur Zakat Me Kya Farq Hai

समाज में कुछ ऐसी बातें फैली हुई हैं जो सही नहीं हैं। आइए उन्हें दूर करें:

ग़लतफ़हमी 1: “मैंने बहुत सदक़ा दिया है, अब मुझे ज़कात देने की ज़रूरत नहीं।”

सच्चाई: हरगिज़ नहीं! ज़कात फ़र्ज़ नमाज़ की तरह है और सदक़ा नफ़िल नमाज़ की तरह। आप कितनी भी नफ़िल पढ़ लें, वो फ़र्ज़ की जगह नहीं ले सकती। ज़कात देना ही होगा।

ग़लतफ़हमी 2: “ज़कात सिर्फ रमज़ान में देनी चाहिए।”

सच्चाई: रमज़ान में सवाब 70 गुना ज़्यादा मिलता है, इसलिए लोग रमज़ान में निकालते हैं। लेकिन अगर आपका साल ‘मुहर्रम’ या ‘रजब’ में पूरा हो रहा है, तो आपको उसी वक़्त ज़कात अदा करनी चाहिए (या एडवांस में रमज़ान में दे दें)।

ग़लतफ़हमी 3: “सिर्फ बीमार या मुसीबत आने पर ही सदक़ा देना चाहिए।”

सच्चाई: सदक़ा ख़ुशी के वक़्त भी देना चाहिए ताकि अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा हो सके।

अज़ीज़ों! ख़ुलासा (Summary) यह है कि ज़कात एक फ़र्ज़ और ज़िम्मेदारी है जो हमारे माल को पाक करती है, और सदक़ा एक मोहब्बत का नजराना है जो हमारे और अल्लाह के ताल्लुक़ को मज़बूत करता है।

कोशिश करें कि दोनों हाथों से अल्लाह की राह में खर्च करें, क्योंकि कफ़न में जेब नहीं होती, लेकिन आपके दिए हुए सदक़ात कयामत के दिन आपके लिए साया बनेंगे।

दुआ:

"या अल्लाह! हमारे दिलों में अपनी मोहब्बत पैदा फ़र्मा। हमें हलाल रिज़्क़ अता फ़र्मा और उसमें से तेरी राह में दिल खोलकर ख़र्च करने की तौफ़ीक़ दे। या रब! हमारी टूटी-फूटी ज़कात और सदक़ात को क़बूल फ़र्मा और इसे हमारी दुनिया की परेशानियों और आख़िरत की सख़्तियों से नजात का ज़रिया बना। 

आमीन या रब्बुल आलमीन।"

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